नोटबंदी की पोल खुलते ही पीएम ने छोङा नया जुमला – कांग्रेस इकानमी पर डायनामाइट लगाकर गयी थी

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आरबीआई की रिपोर्ट से पता चलता है कि काले धन के नाम पर नोटबंदी मोदी जी ने अपने उद्योगपति दोस्तों को लाभ पहुंचाने के लिए की थी, उनहोने जनता का पैसा बैंको मे जमा कराया और उस पैसे से एनपीए खत्म करने की कोशिश की गयी तमाम उद्योगपतियों के लोन माफ कर दिये गये।

आरबीआई की रिपोर्ट से भी साफ है कि 99% पुराने नोट बैंक मे वापस आ गये मतलब काला धन  था ही नही उसकी अफवाह उङाई गयी थी।

आपको याद होगा चुनाव मे मोदी ने इस काले धन से सबके खाते मे 15-15 लाख रुपये जमा कराने का भी एक बङा सपना दिखाया था जो बाद मे सबसे बङा जुमला निकला। इस काले धन की अफवाह को बङा मुददा बनाकर मोदी ने पूरा चुनाव अपने पक्ष में कर लिया था। अब नोटबंदी पर आरबीआई की रिपोर्ट आई तो पीएम नरेंदर मोदी अपनी नाकामी छुपाने के लिए कांग्रेस सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि वह डायनामाइट लगाकर गयी है – मनोज सिंह

प्रधानमंत्री जी ने कहा कि 2014 में यूपीए की सरकार ने देश की अर्थ व्यवस्था में डायनामाइट लगा कर चली गयी। मोदी सरकार को इस डायनामाइट का पता भी लग गया था। तब लोन से फोन मिलते थे। और वही लोन एनपीए बने हुये हैं।

प्रधानमंत्री की बातों को हमे गम्भीरता से लेने की ज़रूरत है। अब सरकार को चाहिये कि वह डायनामाइट तक पहुंचाई गयी अर्थव्यवस्था के लिए जिम्मेदार लोगों के बारे में देश को संसद के माध्यम से अवगत कराए।

प्रधानमंत्री जी को चाहिये कि वह एक श्वेतपत्र जारी करें जिसने यह साफ साफ अंकित हो कि

2009 से 2018 तक किस किस कंपनी – पूंजीपति को कितना कितना लोन किस किस बैंक से दिया गया है ? दिया गया कितना ऋण, कब कब वापस आया  ?

एनपीए होने की शिकायत कब से शुरू हुई और उस बैंक ने ऋण वसूलने के लिये क्या क्या कार्यवाही की ?

एनपीए होने पर आरबीआई और सरकार के क्या दायित्व हैं और सरकार और आरबीआई ने उन दायित्वों को कब पूरा किया और नहीं किया ?

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प्रधानमंत्री जी का यह भी कहना है कि फोन से लोन दिये जाते थे। यह बात झूठ नहीं हो सकती है, क्योंकि फोन से लोन देने की सिफारिश की जा सकती है। सिफारिशें एक सामान्य बात है। महत्वपूर्ण और असरदार लोगो द्वारा लगभग सभी विभागों में फोन से सिफारिशें की जाती रही हैं और आज भी यह की जा रही हैं। अतः यह संभव है कि लोन के लिए फोन से सिफारिश की गयी हो।

इस बात की भी जांच की जानी चाहिये कि किस बैंक ने कितने लोन, फोन की सिफारिश पर दिए हैं, और वह सिफारिश किसकी थी ?

सिफारिश पर लोन देने वाले बैंकों के बड़े अफसरों के खिलाफ क्या कार्यवाही हुयी है ?

वे अभी भी पद पर बने हैं या शांतिपूर्ण तरीके से अवकाश प्राप्त कर लिये हैं ?

अगर बैंकों के बड़े अधिकारियों पर कोई कार्यवाही नहीं होगी तो फोन और लोन की तुकबंदी आगे भी होती रही होगी।

प्रधानमंत्री जी को चाहिये कि एक अधिकार सम्पन्न जांच कमेटी गठित कर के 2009 से अब तक दिये गए बड़े ऋण की समीक्षा कराएं, जांच कराएं और सच संसद के माध्यम से जनता के सामने लाएं। बड़े ऋण की सीमा सरकार खुद ही तय कर सकती हैं। जांच कराना इस लिए भी ज़रूरी है, क्योंकि आरोप लगाने का और फिर कुछ न करने या कह कर खामोश हो जाने का प्रधानमंत्री जी का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड रहा है।

उदाहरण के लिये गुजरात चुनाव में उन्होंने डॉ मनमोहन सिंह पर यह आरोप लगाया कि वे पाकिस्तान सेना के पूर्व जनरल के साथ एक मीटिंग कर के उन्हें सत्ता से बेदखल करने की साज़िश रच रहे हैं पर जैसे ही गुजरात के चुनाव खत्म हुये, उन्होंने इस आरोप पर एक शब्द भी नहीं कहा और सरकार ने इस बयान पर संसद में खेद जता कर इसे भुला देने की कोशिश की ।

ऐसे आरोप जिन पर न जांच होती है और न सच का पता चलता है और न सच ढूंढने की कोशिश की जाती है, अगर प्रधानमंत्री जी द्वारा स्वयं लगाए जाते हैं तो ऐसे आरोपों से प्रधानमंत्री के पद की गरिमा तो गिरती ही है साथ ही देश मे उनके बयानों के प्रति अविश्वसनीयता भी फैलती है – विजय शंकर सिंह

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