नेताओं का दिशाहीन संवेदनहीन होना देश के लिये जितना नुकसानदायक है, जनता का दिशाहीन और संवेदनहीन उससे कहीं ज़्यादा घातक  

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मौसम चाहे सर्द हो या गर्म, बसंत का हो या पतझड़ का चाहे मॉनसून ही क्यूं ना हो, मेरे देश में हवा बहुत तेज़ बहती है यहां वजनदार से वजनदार मुद्दों का खुद को टिका पाना टेढ़ी खीर है।

कहते हैं जिस दिन अख़बार में पढ़ने लायक कोई ख़बर ना छपे तो अख़बार की कीमत डूबने का दुःख आपके पेट में मरोड़े मारने लगता है, बजाय इसके कि चलो कोई एक दिन तो बिना जद्दोजहद के निकला।

वो साईकिल में अपनी बीवी की लाश ढोता आदमी, अस्पताल में बेसिक सुविधा के अभाव में मरने वाले बच्चे, वो एक जानवर कि हत्या के शक में भीड़ द्वारा एक आदमी के साथ जानवरों जैसा बर्ताव, रोज़ एक नया बेरोजगार युवा का पैदा होना, शेल्टर होम में उन 34 लड़कियों का बलात्कार, जैसे ना जाने कित्ते मुद्दे आते गए, सोशल साइट पर छाते गए और बिना किसी समाधान के हवा हो गए..।

सत्ता चाहे जिसकी भी हो,वो इस भीड़ की सही नब्ज़ पकड़ ही लेती है जिससे देश भले ही पटरी से उतर के गिर जाए पर नेता जी की गाड़ी सरपट दौड़ती रहती है हमारी असंवेदनशीलता नेताओं की गाड़ियों में मुफ़्त के पेट्रोल का काम करती है।।

एक रणनीति जो शायद ही कभी कारगर साबित ना होती हो, कि कोई ऐसा नियम, कानून, कोई एक अनुपयोगी मुद्दा या कोई बेहूदा बचकाना सा बयान वाला लोली पॉप भीड़ के हाथ में थमाया जाए और गंभीर मुद्दों से ध्यान हटाया जाए।। और हम जो खुद को तीस मार खां समझ बैठे हैं उनके इशारे पर प्रतिक्रिया देने लगते हैं।

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नेता जिस मुद्दे पर चाहें हमसे प्रतिक्रिया दिलवा देते हैं और हम जागरूकता की झूठी शान में कसीदे पढ़ने लगते हैं..।। जैसी ही आप अख़बार उठाते हैं, या सोशल साइट पर आते हैं तो या तो कोई बुरी ख़बर आपका इंतजार कर रही होती है या किसी नेता की लचीली ज़ुबान से निकले कुछ वाहियात शब्दों का जाल, और इसमें उलझे हम और आप।

मुद्दे रोज़ अपनी गंभीरता के साथ दरवाज़े पर दस्तक देते हैं ,एक गरमागरम बहस के बाद बिना किसी निष्कर्ष के हवा के दिए जाते हैं। रोज़ ये हवा मुद्दों की इतनी रेत उड़ाती है कि मुद्दों का एक विशाल ढेर बन जाता है। इतनी तेज़ी में मुद्दे परोसे जाते हैं कि घण्टे दो घण्टे बाद वो तूफानी मुद्दा किसी तालाब का शांत पानी सा दिखने लगता है और अगले ही दिन आपकी आखों से ओझल।

ज़रूरी नहीं कि आप हर बार किसी सही नेतृत्व का चुनाव कर पाएं, ना ही सही नेतृत्व चुन लेने भर से हमारी आपकी जवाबदारी पूरी हो जाती है, सही या ग़लत दोनों ही परिस्थितियों में आपकी भूमिका अंत तक बनी रहती है।

लोकतंत्र में आलोचना मात्र आपका अधिकार नहीं आपका कर्तव्य भी है।। नेताओं का दिशाहीन संवेदनहीन होना देश के जितना नुकसानदायक है, जनता की दिशाहीनता और संवेदनहीनता कहीं ज़्यादा घातक साबित होगी

राधिका चौधरी

 

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