मायावती के बीजेपी गठबंधन मे शामिल होने के संकेत !

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बसपा सुप्रीमो मायावती ने कुछ दिन पहले एक ऐसा दांव चला कि देखने वाले देखते रह गए. बहाना पेट्रोल-डीजल का दाम बना और निशाने पर नरेंद्र मोदी के साथ राहुल गांधी भी थे. मायावती ने कहा कि पेट्रोल-डीजल के मामले में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने जिस जनविरोधी नीति की शुरुआत की थी, भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार उसी को आगे बढ़ा रही है।

मायावती का यह बयान 2019 में नरेंद्र मोदी को हराने का सपना देख रही कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी है. सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व एक ऐसे महागठबंधन की गोटियां सजा रहा है जिसमें देश के सभी बड़े दलित नेता भाजपा की छतरी के नीचे जमा हों।

ऐसा करना भाजपा की मजबूरी है. दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले पार्टी के एक नेता बताते हैं, ‘पिछले करीब ढाई साल में मोदी सरकार और भाजपा, दोनों ने बाब साहबा अंबेडकर को अपना बताने और जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अंबेडकर को लेकर जो हो सकता था, खुले हाथ से और दिल खोलकर सरकार ने किया. स्मारक से लेकर सड़क तक, संग्रहालय से लेकर जन्मोत्सव तक सारे इंतजाम किए गए. लेकिन अब भी दलित भाजपा को अपना पहला प्यार नहीं मानते।

यही वजह है कि पास खड़े लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा अब ऐसे दल और दोस्त की तलाश में है जो अपने या अपनी पार्टी के वोट उसे ‘ट्रांसफर’ कर सके. उत्तर प्रदेश पर नज़र रखने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक प्रचारक बताते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में मायावती एक ऐसी नेता हैं जिनका अपना एक वोट बैंक है. यह वोट बैंक सिर्फ मायावती की ही सुनता है और वे जिधर जाएंगी वह उधर ही बटन दबाएगा।

वे आगे जोड़ते हैं, ‘अभी चर्चा गर्म है कि राहुल गांधी, अखिलेश यादव और मायावती का महागठबंधन हो सकता है. लेकिन सोचिए, अगर मोदी और मायावती एक साथ आ गए तो उत्तर भारत की राजनीति में कितना बड़ा परिवर्तन हो जाएगा. इस एक फैसले से पूरे उत्तर भारत की सभी सीटों पर असर पड़ेगा।

हमने इस खबर की पुष्टि के लिए बसपा के कुछ नेताओं से बात की. नाम न छापने की शर्त पर उनका कहना था कि बहनजी के एक बेहद करीबी नेता से भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कई बार बात कर चुका है. पहले मायावती कांग्रेस से बात कर रहीं थीं, लेकिन उसने मायावती की मांगों पर कोई खास ध्यान नहीं दिया. मायावती ने कांग्रेस से उत्तर प्रदेश में गठबंधन के बदले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी सीटें मांगी थी. वे चाहती थीं कि कांग्रेस पहले दरियादिली दिखाए और विधानसभा चुनावों में महागठबंधन का ऐलान करे।

लेकिन ऐसा होना अभी मुश्किल लग रहा है. कांग्रेस इन तीन राज्यों में अपनी ताकत कमजोर नहीं करना चाहती, इसलिए मध्य प्रदेश की कुछ सीटों को छोड़कर बाकी राज्यों के मामले में मायावती को कांग्रेस के नेतृत्व से ज्यादा तवज्जो नहीं मिली. सुनी-सुनाई है कि यही बात बहनजी को पसंद नहीं आई. कांग्रेस हाईकमान ने एक बार तो बसपा के एक नेता को यहां तक कह दिया कि उन्हें कांग्रेस के प्रदेश के नेताओं से बात करनी चाहिए. मायावती को लगा जब फैसला राहुल गांधी को करना है तो कांग्रेस के प्रदेश नेताओं से बात क्यों करें. सूत्रों के मुताबिक इसी के बाद कांग्रेस से बातचीत रुकी और भाजपा ने मौके की नजाकत समझकर अपनी बात बढ़ाई. सुनी-सुनाई है कि अगर मायावती एनडीए में आती हैं तो भाजपा उन्हें राष्ट्रीय नेता का दर्जा देगी. मायावती के पास प्रस्ताव भेजा जा रहा है कि पूरे देश में बसपा के चुनाव चिन्ह से करीब 40 उम्मीदवार मैदान में उतरेंगे जिन्हें भाजपा का समर्थन होगा।

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सवाल उठता है कि आखिर भाजपा इतनी बेसब्र क्यों हो रही है. जिन मायावती के पास अभी लोकसभा में एक सांसद नहीं है उन्हें सीधे 40 सीट का ऑफर क्यों दिया जा सकता है? इसका जवाब भी भाजपा के अंदरखाने चल रही खबरों से मिल जाता है. दरअसल भाजपा का शीर्ष नेतृत्व एक अखिल भारतीय दलित महागठबंधन बनाना चाहता है. इसमें उत्तर प्रदेश से मायावती और भीम आर्मी के चंद्रशेखर ‘रावण’ होंगे. बिहार से रामविलास पासवान पहले से ही एनडीए में मौजूद हैं. महाराष्ट्र से रामदास अठावले सरकार में मंत्री हैं. इस तरह तीन बड़े राज्यों में भाजपा एक बड़ा दलित गठबंधन बना सकती है जिसका असर छोटे-छोटे राज्यों पर भी होगा।

भाजपा के नेताओं से जब एससी-एसटी बिरादरी में वोट की सेंध लगाने पर बातचीत होती है तो उन्हें एक चिंता बार-बार सताती है. उनके मुताबिक पार्टी के पास आज भी कोई अपना ऐसा चेहरा नहीं जिसे वे बिरादरी का बड़ा नेता मान सकें. मोदी सरकार में थावरचंद गहलोत हैं जो इस बिरादरी से कैबिनेट मंत्री हैं. वे भाजपा के सभी महत्वपूर्ण समितियों के सदस्य भी हैं. लेकिन यह भाजपा नेतृत्व भी जानता है कि थावरचंद उन्हें एससी समाज का वोट नहीं दिला सकते. यही वजह है कि अब वह एक नया रास्ता अपना रही है।

उत्तर प्रदेश सरकार का अचानक सहारनपुर हिंसा के आरोपित चंद्रशेखर ‘रावण’ को रिहा करने का फैसला भी इसी रणनीति का एक बड़ा अहम पहलू है. उत्तर प्रदेश पुलिस का कहना है कि ऐसा चंद्रशेखर की मां की अपील पर किया गया है. सच यह है कि उन्होंने तो सरकार से बहुत पहले अपील की थी, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल में बंद रावण को छोड़ने का फैसला अब जाकर दिल्ली से हुआ जिसे लखनऊ ने आगे बढ़ाया।

सुना तो यहा तक जा रहा है कि  चंद्रशेखर वाम दलों के नेताओं से भी नाराज़ थे और अगला लोकसभा चुनाव भीम आर्मी की तरफ से लड़ना चाहते थे. लेकिन भीम आर्मी अभी इतनी ताकतवर नहीं कि मायावती के उत्तर प्रदेश में उन्हें चुनाव जितवा सके. इसलिए चंद्रशेखर को एक बड़े नेता का सहारा तो चाहिए. सूत्रों के मुताबिक भाजपा अब एक तीर से दो शिकार करना चाहती है. अगर मायावती और चंद्रशेखर दोनों साथ आ गए तो बहुत अच्छा वरना भीम आर्मी हर सीट पर अपना उम्मीदवार उतारेगी और हर जगह बहनजी का वोट काटेगी. जाहिर है कांग्रेस के वॉर रूम में हालात बेहद तनाव वाले हैं. अब मायावती की सीधे सोनिया गांधी से बात कराने की कोशिश हो रही है. लेकिन मायावती हैं कि अब अपने पत्ते खोलना ही नहीं चाहतीं।

2019 का चुनाव देश के दो बड़े नेताओं के लिए सबसे अहम होगा. पहले, नरेंद्र मोदी जो अभी 68 के होने वाले हैं और वे हर हाल में अगला चुनाव जीतना चाहेंगे क्योंकि 2024 में वे खुद 73 के हो चुके होंगे जो उनके द्वारा ही तय की गई रिटायरमेंट की उम्र सीमा से बस दो साल कम होगा. राहुल गांधी के पास उम्र की कमी नहीं है इसलिए वे 2024 का भी इंतजार कर सकते हैं।

मायावती की स्थिति सबसे नाजुक है. लोकसभा में उनके पास एक भी सांसद नहीं है. राज्यसभा से वे खुद इस्तीफा दे चुकी हैं. उत्तर प्रदेश की विधानसभा में उनकी पार्टी तीसरे नंबर पर है और उनके पास इतने विधायक भी नहीं हैं कि बसपा अपने दम पर राज्यसभा की एक सीट भी जीत सके. यानी 2019 का चुनाव मायावती के लिए सबसे निर्णायक चुनाव होगा. इसलिए मायावती भी कुछ ऐसा करेंगी जिससे वे केंद्र की सत्ता में धुरी बन सकें और एक साथ कई राज्यों में अपनी पार्टी को ज़िंदा करने का सपना देख सकें।

साभार सत्याग्रह

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