मोदी सरकार पूंजीपतियों के फायदे के लिए किसानों को बर्बाद कर रही है

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देश का किसान आखिर सड़क पर क्यों उतर रहा है ?

4 साल 4 महीने बीतने के बाद आखिर में मोदी सरकार ने किसानों को MSP का झुनझुना पकड़ा दिया है। जो यथार्थ के धरातल पर महज एक जुमला साबित हुआ है। अभी तक सिर्फ पूंजीपतियों के फायदे के लिए देश मे फसलों का पर्याप्त उत्पादन होने के बावजूद भी भारी-भरकम रकम खर्च करके विदेशो से खाद्य उत्पादों का आयात किया जा रहा था। आयात करने वाले बीजेपी को चंदा देने वाले मोटे सेठ लोग थे। मोदी जी अपने इन्ही वित्तपोषकों के चुनावी चंदे की क़िस्त चुकाने विदेश जाते हैं।

याद कीजिये मोज़ाम्बिक से दाल, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से गेहूं, आलू, ब्राज़ील से राॅ शुगर, मेक्सिको और अफ्रीका से सरसों, सोयाबीन और यहां तक कि पाकिस्तान से प्याज़ और शक्कर का आयात किया गया था।

इन्ही पूंजीपतियों के फायदे के लिए अनाजों, दालों पर इम्पोर्ट ड्यूटी हटाकर या कम कर आयात सस्ता किया गया। जबकि देश का किसान अपनी उपज घोषित सरकारी मूल्य से भी कम दामो में मंडी में बेचने को मजबूर किया गया। कोई आरटीआई एक्सपर्ट हो तो कृषि और वाणिज्य मंत्रालय से सूचना प्राप्त कर पुष्टि कर सकता है।

देश मे इस साल 4.5 मिलियन टन दाल का उत्पादन हुआ है,जबकि कुल घरेलू मांग 3.2 मिलियन टन है। इसके बावजूद भारत सरकार के केंद्रीय वाणिज्य एवम उद्योग मंत्रालय के विदेश व्यापार महानिदेशक ने इसी 11 जून को आदेश पारित किया है कि 31 अगस्त तक म्यांमार एवम अफ्रीकी देशों से 199891 मीट्रिक टन अरहर दाल,149964 मीट्रिक टन मूंगदाल,149982 मीट्रिक टन उड़द दाल मंगा लिए जाए। यह आदेश मोदी जी के वर्ष 2016 के म्यांमार एवम अफ्रीकी देशों की यात्रा के दौरान किये गए समझौतों के अनुपालन में दिए गए थे।

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पिछले साल बाजरे का समर्थन मूल्य 1405 रु घोषित किया था।1100- 1200 के बीच बिका।इस साल के लिए 1900 रु से ऊपर तय किया है तो मंडी में 1150 रु में बिक रहा है।

इस साल दाल का समर्थन मूल्य 5050 रु प्रति कुंतल था जबकि किसान खुले बाजार में 4000 रु प्रति कुंतल बेचने पर मजबूर हुआ है।

गेँहू का समर्थन मूल्य 1735 रु प्रति कुंतल था लेकिन किसान का गेँहू मंडी में 1450 – 1530 रु कुंतल में गया।

अभी तक देश के गन्ना किसानों का 22 हजार करोड़ रु भुगतान नही हुआ औऱ दूसरी तरफ पाकिस्तान से चीनी मंगा ली गयी।

लागत मूल्य में बाजीगरी कर अब न्यूनतम समर्थन मूल्य का डेढ़ गुना दाम देने की बात से किसानों को गुमराह किया गया। मंडी और व्यापारियों के चक्रव्यूह को भेदना इतना आसान होता तो किसान अपने फसली उत्पाद औऱ दूध सड़को पर न फेंक रहा होता। दूध के नाम पर याद आया ,तनिक सहकारी डेयरी में पशुपालकों द्वारा बेचे गए दूध के दाम तो चेक कीजिये। पिछले दो साल की तुलना में अब पौने रेट मिल रहे हैं,जबकि पशु आहार के दाम ड्योढ़े हो चुके हैं।

पूंजीवादियों की पोषक इस सरकार ने पहले खाद ,यूरिया की 50 किलो की बोरी का वजन 5 किलो घटा कर 45 किलो कर दिया फिर दाम बढ़ा दिए।

डीजल के बढ़े दामो का सीधा प्रभाव खेती की लागत पर पड़ता है। कीटनाशकों के दाम भी आसमान छू रहे हैं।

कभी शक्कर,चिप्स, कोल्डड्रिंक के दाम घटते सुने हैं ? नही न ,इसी से सरकारी नीतियों में किसानों पर व्यापारियों की महत्ता का अंदाजा लगा लीजिये।

धन्नासेठ उद्योगपतियों को कर्जमाफी और अन्नदाता किसानों को गोली लाठी ? अब ये नही चलेगा। एक झूठे ने 2014 से पहले हर चुनावी रैली और पोस्टरों में झूठे वायदे कर जनता को ठग लिया था। अब नही ठग पायेगा। गाँव वाले बड़े परपंची होते हैं। टाइम भी खूब है। सरकार को जबाब तो मिलेगा ही।


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