शिवपाल सिंह यादव ने कहा अगली सरकार की चाबी उनके पास, चुनाव आयोग ने भी चुनाव चिह्न चाबी पर मुहर लगा दी

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प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष ने कहा था कि वो आगामी लोकसभा चुनाव में वो किंग मेकर होंगे। यानी सत्ता की चाबी उनके पास ही होगी। शिवपाल के इस बयान के चौबीस घंटे बाद चुनाव आयोग ने प्रसपा को चाबी चुनाव चिन्ह दे दिया। इस बात में कोई शक नहीं कि चाबी वाकई बहुत अच्छा चुनाव चिन्ह है। अर्थपूर्ण है। खास-ओ-आम के उपयोग की चीज है। हर जुबान पर आसानी से आ जाने वाला चिन्ह है। हर राजनीतिक दल यही चाहता है कि उसे आम इंसान की जुबां पर आने वाला और अर्थपूर्ण चुनाव चिन्ह मिले। शिवपाल भी यही चाहते थे। पहले से ही ये भी कह रहे थे कि वो सत्ता की चाबी बनने जा रहे हैं। और फिर प्रसपा को चुनाव आयोग द्वारा चाबी चुनाव चिन्ह मिल जाने के बाद चर्चाएं ये भी हो रही हैं कि ये साबित हो गया कि शिवपाल यादव पर केंद्र की सत्ता मेहरबान है।भाजपा से उनका अंदरूनी रिश्ता है या मिलीभगत है। लेकिन जरूरी नहीं कि लोगों की इस किस्म की शंकाओं में कोई दम हो। ये भी हो सकता है कि प्रसपा प्रमुख की अटूट कोशिश-चाहत, विवेक और भाग्य से उन्हें ये चुनाव चिन्ह मिला हो।

ये तमाम बातें तो चुनाव चिन्ह की थीं। अब उनके राजनीतिक भविष्य और मौजूदा वक्त की बात की जाये तो ये भी नजर आ रहा है कि शिवपाल यादव के हाथों से सत्ता की चाबी खो भी सकती है। उनके राजनीतिक भविष्य की भी चाबी गुम हो सकती है। बेटे समान भतीजे और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने शिवपाल को इसकद्र नजरअंदाज करना शुरू कर दिया था कि मजबूरन उन्हें अपनी पार्टी का गठन करना पड़ा। इसके बाद भी शिवपाल यादव नम्र रहे और सपा में सम्मानजनक अपनी वापसी के लिए अखिलेश यादव को संकेत देते रहे। फिर उन्होंने साफ कहा कि वो सपा-बसपा गठबंधन में शामिल होना चाहते है।

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इस सब के बावजूद सपा-बसपा गठबंधन के एलान वाली अखिलेश – मायावती की पहली प्रेस कांफ्रेंस में मायावती ने शिवपाल पर भाजपा की मिलीभगत के आरोप लगाये। जबकि सच ये है कि सपा-बसपा नेताओं से ज्यादा शिवपाल भाजपा सरकार के खिलाफ जहर उगल रहे हैं। जिससे ये जाहिर होता है कि शिवपाल यादव भाजपा के गठबंधन में शामिल नहीं हो सकते और ना ही फ्रेंडली फाइट की कोई गुंजाइश है।

क्षेत्रीय राजनीति करने वाले दलों के बड़े नेताओं के लिए भी लोकसभा सीट जीतना आसान नहीं होता है, ऐसे में नवगठित प्रसपा के लिए बिना गठबंधन के एक भी सीट भी जीतना आसान नहीं है। और तब जब दलितों – पिछड़ों के वोट बैंक को गोलबंद करने के लिए यूपी की एक एक सीट पर सपा-बसपा गठबंधन मजबूती से लड़ने जा रहा है। भाजपा की लहर भी अभी बहुत कमजोर नहीं हुई है और भाजपा गठबंधन भी मजबूती से लड़ेगा। यूपी में कांग्रेस भी जोर लगाने की तैयारी कर रही हैं। यहां राहुल गांधी की धुंआधार रैलियां होनी है। ऐसे में प्रसपा के पास कांग्रेस ही एक सहारा बचा है।

शिवपाल यादव लगातार इस कोशिश में लगे हैं कि कांग्रेस उनके लिए सम्मानजनक कुछ सीटें छोड़ दें। कांग्रेस नेता अहमद पटेल, सलमान खुर्शीद और राजबब्बर से उनकी बात हो चुकी है। लेकिन राहुल गांधी ने अभी इस पर कोई फैसला नहीं किया है। यदि कांग्रेस ने प्रसपा के लिए चंद सीटें नहीं छोड़ी तो शिवपाल यादव की सत्ता की चाबी ही नहीं उनके राजनीतिक भविष्य की भी चाबी गुमनामी के अंधेरों में खो सकती है। क्योंकि प्रसपा वोट कटवा तो बन सकती है किन्तु वो लोकसभा की एक भी सीट जीत सके ये बेहद मुश्किल है -नवेद शिकोह
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