खान अब्दुल गफ्फार खान ने पंडित नेहरु से ऐसा क्या कहा कि नेहरू जी के आंसू आ गये

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नेहरू आप बापू की रक्षा छह महिने भी नहीं कर सके — बादशाह खान का नेहरू को उलाहना

जैसे ही खान अब्दुल गफ्फार खान ने पंडित जवाहरलाल नेहरु से ये कहा नेहरु ही नहीं वहां उपस्थित सभी जनमानस सन्न रह गए समय था गांधी जी के निधन के बाद का और वो समय भी था जब महात्मा के निधन के बाद पाकिस्तान से आये बादशाह खान और नेहरू का सामना हुआ जैसे ही पंडित नेहरु सीमांत गांधी को दिखे उन के मुंह से निकला नेहरु आप का प्रशासन आप की पुलिस आप की सेना बापू की छह महिने भी सुरक्षा नहीं कर सकी बंटवारे के बाद पाकिस्तान जाते हुए मैं ने ये नहीं सोचा था की आजाद राष्ट्र अपने पिता की राष्ट्रपिता को छह महिने भी नहीं संभाल पायेगा बादशाह के इन शब्दों में गुस्सा नहीं था एक दुख था एक टीस थी एक दर्द था।

नेहरु जी ने कुछ नहीं कहा पर उन की आंखों में आंसू थे तभी पिछे से आवाज आई खान अगर तुम यहां होते तो क्या बापू को बचा लेते नेहरु व बादशाह ने पीछे मुङ कर देखा की कौन बोला पर भीङ इतनी थी की पता चल नहीं सकता था की आवाज कहां से आई पर बादशाह ने जवाब फिर भी दिया की मुझे नहीं पता मैं बापू को बचा पाता या नहीं पर ये इस पठान का दावा है की उस के साथ होते अगर बापू को कुछ होता तो ये पठान का बच्चा उन की बगल में मुर्दा पङा होता अगर मैं बापू पर चली पहली गोली अपने सीने पर ना ले पाता तो निश्चित मानों उस हत्यारे की आखिरी गोली छाती पर अवश्य खाता क्यों की बापू की रक्षा ना कर पाने के बाद इस पठान को भी जिंदा रहने का कोई हक नहीं था।

सीमांत गांधी ने आगे कहा की हिंदूं महासभा और आर एस एस का ये कोई पहला हमला तो नहीं था 1942 में शुरू हुए भारत छोड़ो आन्दोलन को शुरू करने के बाद महात्मा गांधी पर 6 हमलें तो आजादी के पहले ही इन फिरक्कापरस्ती ताकतों ने किये थे तब अंग्रेजों का शासन था तब हमने ये हमले सफल नहीं होने दिये तो अब तो हिंदुस्तान आजाद मूल्क था और आजादी के छह महिने के भीतर बापू की रक्षा नहीं की जा सकी औऱ सबसे ज्यादा दुखद बात तो ये रही है एक हमला सिर्फ दस दिन पहले हुआ और उस से भी कोई सबक नहीं लिया गया और बापू की सुरक्षा और ज्यादा मजबूत नहीं की गई तभी तो ये मुठ्ठीभर साम्प्रदायिक तत्व इस घृणित कार्य को अंजाम दे सके

ऐसे थे फ्रंटियर गांधी बापू के इस हद तक शैदाई
वास्तव में अगर कोई विचारों और सिद्धांतों से गांधी के सबसे अधिक नजदीक थे तो वे बादशाह खान ही थे ना कभी कोई पद मांगा ना नाम की ख्वाहिश की ना चाहा की ये अधिकार ना कभी मंच पर बैठना चाहा ना कभी खुद को गांधी जी के उतने करीबी बताना चाहा या दिखाना चाहा जितने वे वास्तव में पास थे हजारों की सभा में भी सबसे पीछे एक आम कार्यकर्ता की तरह जमीन पर बैठे बादशाह खान ना कोई महत्वकांक्षा ना कोई अभिलाषा ना कोई आकांक्षा

अभी पहले वाली बात पर ही रहते है उसी दिन किसी ने नेहरु जी से पूछा आप ने खान को कोई जवाब क्यों नहीं दिया नेहरू जी ने बङी सरलता से कहा क्या जवाब देता वो सच कह रहे थे और सच को सुनना पङता है उसका जवाब ना होता है ना दिया जा सकता है उस के अगले दिन बादशाह खान ने सरदार पटेल से भेंट की और 20 जनवरी को बापू पर हुए पहले हमले के बाद फोन पर हुई बादशाह खान और पटेल के बीच हुए वार्तालाप के बारे में बात की तब पटेल ने खान को बापू की सुरक्षा बढाने का भरोसा दिलाया था इस बारे में पूछने पर सरदार पटेल ने बताया की उन्होंने सुरक्षा बढाई भी थी जिस में प्राथर्ना सभा में आने वालों की तलाशी लेना भी शामिल था इस के बारे में गांधी को बताया नहीं गया था पर दूसरे दिन ही गांधी जी से किसी ने शिकायत कर दी तब उन्होंने कहा की क्या अब वे प्रार्थना भी पुलिस के पहरे में करेंगे अगर वे ऐसा चाहते है तो उन्हें एक कमरें में बंद कर दें और चाबी खुद ले जायें

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तब मजबूरन हमें तलाशी को बंद करवाना पङा आगे सरदार पटेल ने खान को बताया की बापू सुरक्षा के नाम पर एक सिपाही तक रखने को तैयार नहीं थे पर फिर भी हमने कुछ सुरक्षा इस तरह तैयार की थी वे बापू से दूर रहें और बापू को शिकायत का मौका ना दें इस के अलावा सुरक्षा के लिए कुछ पुलिसकर्मी हमने सादी वर्दी में भी तैनात किये थे जिन में वो मराठा हवलदार भी शामिल था जिस ने बापू के हत्यारे को गिरफ्तार किया था यहां आश्चर्यजनक बात ये है की हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ये दावा करता है की

गांधी की हत्या के बाद नाथूराम गौडसे ने भागने की कोशिश नहीं की थी पर सरदार पटेल ने तब बादशाह खान को बताया था की बापू के गोली लगने के बाद मचे हङकंप के बीच गौडसे ने भागने की कौशिश की थी और भारी भीड़ और शोर शराबे में वो ऐसा कर भी सकता था पर महाराष्ट्र पुलिस के उस मराठे हवलदार ने ऐसा होने नहीं दिया वो गांधी की हत्या के समय उन से थोङा दूर था पर तुरंत वो वहां पहुंचा और उस ने गौडसे का हाथ पकङ लिया जिस में गोली चलने वाला हथियार अब भी वो कसकर पकड़े हुए था और उससे वो हथियार छिनने से पहले गौडसे ने उस हवलदार से धक्कामुक्की भी की थी पर मजबूत मराठे हवलदार के आगे गौडसे की एक ना चली औऱ वो रिवाल्वर गौडसे के हाथ से निकल गया उस के बाद भी गोडसे ने भागने की कौशिश की तब खिसकते हुए गोडसे की टांग उस मराठे हवलदार के हाथ में आ गई तब लगभग चार पांच फीट तक गौडसे को खिंच कर वो पीछे ले गया तब कुछ और लोगों ने भी गोडसे को पीटना शुरू कर दिया और जब तक अन्य पुलिस वहां पहुंची तब तक लहूलुहान गौडसे उस हवलदार की मजबूत गिरफ्त में था

इस के बाद पटेल ने बताया की गांधी की हत्या को वो गृहमंत्री की विफलता के रूप में देखते है और उन्होंने इस्तीफा देने का फैसला भी किया पर पंडित नेहरू ने उस विकट समय में इस्तीफे जैसी बात ही करने से मना कर दिया तब खान ने पटेल को बताया की वो बापू को छोड़ कर पाकिस्तान जाने का फैसला नहीं कर पा रहा था तब महात्मा ने ही उन्हें कहा था की खान अगर तेरा मन पाकिस्तान जाने का है तो तूं पाकिस्तान जा मैं बहुत जल्द शायद दो या तीन महिने में ही तेरे पास पाकिस्तान आउंगा पर वो दिन कभी नहीं आया हिंदुस्तान में हो रहे दंगे फसाद को रोकने में ही बापू लगे रहे और शायद जीवित रहते तो मार्च के मध्य में उन का पाकिस्तान आने का विचार था जैसा की उन्होंने फोन पर बादशाह खान को बताया था तब बादशाह ने सरदार से अपना वो पूराना किस्सा भी सांझा किया जिसे पटेल पहले से ही जानते थे

1942 में जब अंग्रेजों भारत छोङो आन्दोलन शुरू करने से पहले आन्दोलन की रुपरेखा तैयार की जा रही थी तब बापू ने प्रत्येक के लिए अलग रणनीति तय की थी और कहा था की अंग्रेजी सरकार आन्दोलन को विफल करने के लिए सभी बङे नेताओं को आन्दोलन शुरू होने पहले ही गिरफ्तार कर सकती है इसलिये सभी बङे नेताओं को जहां तक हो सके गिरफ्तारी से बचना है और अगर गिरफ्तार होना भी पङे तो भी उन्होंने पहले वो सभी कार्य मुकम्मल करें जो उन सब को सौंपें गए है ताकी जिस जन जागृति के लिए उस आन्दोलन का चरम पर पहुंचना जरुरी है उसे हम हासिल कर सके गांधी जी का विचार था की अगर हम इस आन्दोलन को सुचारु रूप से शुरू कर सके तो बाद में चाहे हम सब गिरफ्तार हो जाये पर तब तक ये जनता का आन्दोलन बन जायेगा तब इसे कोई नहीं रोक पायेगा और जब जनशक्ति खिलाफ हो तो किसी का भी उस जनता पर ज्यादा दिन तक शासन करना संभव नहीं रह पायेगा

इस बात से खान अब्दुल गफ्फार खान का रिश्ता ये था की जब गांधीजी सभी नेताओं का कार्य तय कर रहे थे सभी की जिम्मेदारी तय कर रहे थे तभी किसी ने पूछा बादशाह खान को कौन सी जिम्मेवारी दी गई है तब गांधी जी ने सभी को सुनाते हुए कहा था बादशाह मेरे साथ रहेगा खान को इसी बात पर सबसे ज्यादा अफसोस था की बापू ने तो कहा था बादशाह मेरे साथ रहेगा पर मै ने बापू का साथ छोड़ दिया और इस बात का अफसोस इस पठान को ताउम्र रहेगा की जब बापू ने कहा था की बादशाह मेरे साथ रहेगा तो मैं ने उन का साथ क्यों छोड़ दिया
Rajender Godara


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