भारतीय ईवीएम सिर्फ 2 सेकेंड मे हैक होती है, ये बात चुनाव आयोग को पता है – अमरीकी हैकर

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भारत मे कुछ हफ़्तों बाद होने वाले लोकसभा चुनावों में लगभग 80 करोड़ मतदाता और लगभग 2000 चुनावी दल हिस्सा लेने जा रहे हैं।

अमरीकी हैकरों का दावा सही है

हैकर ने दावा किया कि साल 2014 के चुनाव में मशीनों को हैक किया गया था. इस चुनाव में बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने भारी बहुमत के साथ जीत दर्ज की थी।हालांकि, भारतीय चुनाव आयोग ने इन दावों का खंडन किया है. लेकिन इन मशीनों में तकनीक के इस्तेमाल को लेकर आशंकाएं ज़ाहिर की गई हैं।

भारत की अलग-अलग अदालतों में इस मुद्दे पर कम से कम सात मामले चल रहे हैं. लेकिन चुनाव आयोग हर मौके़ पर इन मशीनों को हैकिंग प्रूफ़ बताता आया है। भारत के चुनाव में 16 लाख ईवीएम मशीनें इस्तेमाल की जाती हैं और ऐसी हर एक मशीन में अधिकतम 2000 मत डाले जाते हैं।

किसी भी मतदान केंद्र पर पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 1500 और उम्मीदवारों की संख्या भी 64 से ज़्यादा नहीं होती है. भारत में बनीं ये मशीनें बैटरी से चलती हैं। ये मशीनें उन इलाक़ों में भी चल सकती हैं जहां बिजली उपलब्ध नहीं होती है. इन मशीनों के सॉफ़्टवेयर को एक सरकारी कंपनी से जुड़े डिज़ायनरों ने बनाया था। चुनाव आयोग के मुताबिक़, ये मशीनें और इनमें दर्ज रिकॉर्ड्स को किसी भी बाहरी समूह के साथ साझा नहीं किया जाता है।जबकि चुनाव आयोग का यह दावा पूरी तरह से झूूूूठा है ।

कैसे काम करती हैं ये ईवीएम मशीनें

मतदाताओं को वोट करने के लिए एक बटन दबाना होता है. मतदान अधिकारी भी एक बटन दबाकर मशीन बंद कर सकता है ताकि मतदान केंद्र पर हमला होने की स्थिति में जबरन डाले जाने वाले फर्ज़ी मतों को रोका जा सके।

मतदान से जुड़े रिकॉर्ड्स रखने वाली मशीन पर मोम की परत चढ़ी होती है. इसके साथ ही इसमें चुनाव आयोग की तरफ़ से आने वाली एक चिप और सीरियल नंबर होता है।

लोकसभा चुनाव

इस मशीन को अब तक 113 विधानसभा चुनावों में इस्तेमाल किया जा चुका है. इन मशीनों के प्रयोग से मतगणना का काम बहुत तेज़ी से होता है। एक लोकसभा सीट के लिए डाले गए मतों को महज़ तीन से पांच घंटों में गिना जा सकता है जबकि बैलट पेपर के दौर में इसी काम को करने में 40 घंटों का समय लगता है।

क्या हैकिंग संभव है ?

चुनाव आयोग इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के पूरी तरह सुरक्षित होने का दावा करता आया है. लेकिन समय-समय पर इन मशीनों के हैक होने की आशंकाएं सामने आती रही हैं। आठ साल पहले, अमरीका की मिशिगन यूनिवर्सिटी से जुड़े वैज्ञानिकों ने एक डिवाइस को मशीन से जोड़कर दिखाया था कि मोबाइल से संदेश भेजकर मशीन के नतीजों को बदला जा सकता है।

हालांकि, भारत के चुनाव आयोग ने इस दावे को ख़ारिज करते हुए कहा था कि मशीन से छेड़छाड़ करना तो दूर, ऐसा करने के लिए मशीन हासिल करना ही मुश्किल है। इसके दो कारण हो सकते हैं एक तो चुनाव आयोग को मोटी कमाई मिलती होगी और दूसरा ईवीएम हैकिंग के शोर मचाने वाले उसका कुछ नही बिगाङ सकते।

लोकसभा चुनाव

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वहीं, मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से जुड़े विशेषज्ञ धीरज सिन्हा मानते हैं कि लाखों वोटिंग मशीनों को हैक करने के लिए काफ़ी ज़्यादा धन की ज़रूरत होगी और ऐसा करने के लिए इस काम में मशीन निर्माता और चुनाव कराने वाली संस्था का शामिल होना ज़रूरी है, इसके लिए एक बहुत ही छोटे रिसिवर सर्किट और एक एंटीना को मशीन के साथ जोड़ने की ज़रूरत होगी जोकि ‘इंसानी आंख से दिखाई नहीं देगा।

वह कहते हैं कि वायरलैस हैकिंग करने के लिए मशीन में एक रेडियो रिसीवर होना चाहिए जिसमें एक इलेक्ट्रॉनिक सर्किट और एंटीना होता है। चुनाव आयोग का दावा है कि भारतीय वोटिंग मशीनों में ऐसा कोई सर्किट ऐलीमेंट नहीं हैं. कम शब्दों में कहे तो इतने व्यापक स्तर पर हैकिंग करना लगभग नामुमिकन होगा।

दुनियाभर में  वोटिंग मशीनों का हाल

दुनिया में लगभग 33 देश किसी न किसी तरह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग की प्रक्रिया को अपनाते हैं और उन मशीनों की प्रामाणिकता पर सवाल उठे हैं। वेनेज़ुएला में साल 2017 के चुनावों में डाले गए मतों की कुल संख्या कथित रूप से असली संख्या से दस लाख ज़्यादा निकली. राजनेताओं ने इसी साल मतों की गोपनीयता और नतीजों में छेड़छाड़ की आशंकाएं जताते हुए ई-वोटिंग कराने की योजना से किनारा कर लिया है।

इराक़ में साल 2018 में हुए चुनाव के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी की ख़बरों के बाद मतों की आंशिक गिनती दोबारा करवाई गई थी।

बीते साल दिसंबर महीने में डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो में ई-वोटिंग से पहले मशीनों की टेस्टिंग न किए जाने की ख़बरें सामने आने के बाद ई-वोटिंग मशीनें विवाद का विषय बनी थीं। अमरीका में वोटिंग मशीनों को लगभग 15 सालों पहले इस्तेमाल में लाया गया था।

इस समय अमरीका में लगभग 35000 मशीनें इस्तेमाल होती हैं. इस तरह मतदान में काग़ज़ी सबूत न होने से मशीन के स्तर पर ग़लत मतदान रिकॉर्ड होने पर उसके सुधार की गुंजाइश कम होने से जुड़ी चिंताएं जताई गई थीं। इन चुनावों में मतों की गिनती करने वाली मशीनों में एक प्रोग्राम पाया गया जोकि दूर बैठे सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर को मशीन में फ़ेरबदल करने की सुविधा देता था। साउथ कैरोलिना यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस विभाग के प्रोफ़ेसर डंकन बुएल इसी विषय पर शोध कर रहे हैं।

तकनीक का लोकतंत्र मे उपयोग

डंकन बुएल ने कहा, “मेरा मानना है कि हमें चुनावी प्रक्रिया में तकनीक का इस्तेमाल कम से कम करना चाहिए. सॉफ़्टवेयर ठीक ढंग से काम करें, ये मुश्किल होता है और वो भी तब जब मतों और मतदाताओं के बीच संबंध स्थापित न किया जाना हो. ऐेसे में इसकी पुष्टि करने का कोई सही तरीक़ा नहीं है कि ये चीज़ें अपेक्षानुसार काम करें।

इस सबके बावजूद भारत में चुनावों को पारदर्शी और भरोसेमंद बनाने के लिए शायद सही दिशा में काम हो रहा है। पांच साल पहले, सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि सभी वोटिंग मशीनों में वीवीपैट मशीनें (मतदान से जुड़ी रसीदें छापने वाली मशीन) भी लगी होनी चाहिए।

इन मशीनों के लगे होने पर जब एक मतदाता अपना मत डालता है तो मत दर्ज होते ही प्रिंटिंग मशीन से एक रसीद निकलती है जिसमें एक सीरियल नंबर, उम्मीदवार का नाम और चुनाव चिह्न दर्ज होता है. ये सूचना एक पारदर्शी स्क्रीन पर सात सेकेंड के लिए उपलब्ध रहती है। हालांकि, सात सेकेंड के बाद ये रसीद निकलकर एक सीलबंद डिब्बे में गिर जाती है।


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