2019 चुनाव से पहले, बीजेपी अयोध्या में 1992 जैसे हालात पैदा कर रही हैं।

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2019 लोकसभा चुनाव से पहले, बीजेपी अयोध्या मजैसे हालात पैदा कर रही हैं।

अयोध्या में राममंदिर निर्माण के मसले पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े विश्व हिंदू परिषद (विहिप) जैसे संगठन कोई बड़ी योजना बना रहे हें. द एशियन एज़ में सूत्रों के हवाले से छपी ख़बर की मानें तो यह योजना 1992 जैसा आंदोलन खड़ा करने की हो सकती है. इसकी वज़ह भी पुख़्ता बताई जाती है. इसके मुताबिक विहिप जैसे हिंदू संगठनों में एक बड़े वर्ग की धारणा है कि अयोध्या का मसला ही भाजपा को 2019 के लोक सभा चुनाव में जीत दिला सकता है. लिहाज़ा इस मुद्दे को बड़े आंदोलन की शक़्ल में पुनर्जीवित करना ज़रूरी है. ग़ौरतलब है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर हिंदू संगठन लगातार दबाव बना रहे हैं कि वह संसद से कानून पारित कराए और राम मंदिर निर्माण का रास्ता तैयार करे. केंद्र और महाराष्ट्र में भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने भी इस बार सक्रियता बढ़ाई है. उसकी ओर से नारा दिया गया है, ‘हर हिंदू की यही पुकार, पहले मंदिर फिर सरकार.’ शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे 24-25 नवंबर अयोध्या भी जा रहे हैं…………इसे पूरी पढ़े और समझने की कोशिस करें ,

‘बाबरी मस्जिद उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद ज़िले के अयोध्या शहर में एक मस्जिद थी। रैली के आयोजकों द्वारा मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुंचाने देने की भारत के सर्वोच्च न्यायालय से वचनबद्धता के बावजूद, 1992 में (आरएसएस, भाजपा, विहिप) जैसी संगठन के लोगो ने बाबरी मस्जिद को विध्वस्त करने का काम किया , अब

इतिहस के कुछ पन्नो को पढ़ें ,आखिर विवाद कैसे हुवा

आधुनिक समय में इस मसले पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हिंसा की पहली घटना 1853 में अवध के नवाब वाजिद अली शाह के शासनकाल के दौरान दर्ज की गयी। निर्मोही नामक एक हिंदू संप्रदाय ने ढांचे पर दावा करते हुए कहा कि जिस स्थल पर मस्जिद खड़ा है वहां एक मंदिर हुआ करता था, जिसे बाबर के शासनकाल के दौरान नष्ट कर दिया गया था। अगले दो वर्षों में इस मुद्दे पर समय-समय पर हिंसा भड़की और नागरिक प्रशासन को हस्तक्षेप करते हुए इस स्थल पर मंदिर का निर्माण करने या पूजा करने की अनुमति देने से इंकार करना पड़ा.

फैजाबाद जिला गजट 1905 के अनुसार, “इस समय (1855) तक, हिंदू और मुसलमान दोनों एक ही इमारत में इबादत या पूजा करते रहे थे। लेकिन विद्रोह (1857) के बाद, मस्जिद के सामने एक बाहरी दीवार डाल दी गयी और हिंदुओं को अदंरुनी प्रांगण में जाने, वेदिका (चबूतरा), जिसे उन लोगों ने बाहरी दीवार पर खड़ा किया था, पर चढ़ावा देने से मना कर दिया गया।”

1883 में इस चबूतरे पर मंदिर का निर्माण करने की कोशिश को उपायुक्त द्वारा रोक दिया गया, उन्होंने 19 जनवरी 1885 को इसे निषिद्ध कर दिया। महंत रघुवीर दास ने उप-न्यायाधीश फैजाबाद की अदालत में एक मामला दायर किया। 17 फीट x 21 फीट माप के चबूतरे पर पंडित हरिकिशन एक मंदिर के निर्माण की अनुमति मांग रहे थे, लेकिन मुकदमे को बर्खास्त कर दिया गया। एक अपील फैजाबाद जिला न्यायाधीश, कर्नल जे.ई.ए. चमबिअर की अदालत में दायर किया गया, स्थल का निरीक्षण करने के बाद उन्होंने 17 मार्च 1886 को इस अपील को खारिज कर दिया। एक दूसरी अपील 25 मई 1886 को अवध के न्यायिक आयुक्त डब्ल्यू. यंग की अदालत में दायर की गयी थी, इन्होंने भी इस अपील खारिज कर दिया। इसी के साथ, हिंदुओं द्वारा लड़ी गयी पहले दौर की कानूनी लड़ाई का अंत हो गया।

1934 के “सांप्रदायिक दंगों” के दौरान, मस्जिद के चारों ओर की दीवार और मस्जिद के गुंबदों में एक गुंबद क्षतिग्रस्त हो गया था। ब्रिटिश सरकार द्वारा इनका पुनर्निर्माण किया गया।

मस्जिद और गंज-ए-शहीदन कब्रिस्तान नामक कब्रगाह से संबंधित भूमि को वक्फ क्र. 26 फैजाबाद के रूप में यूपी सुन्नी केंद्रीय वक्फ (मुस्लिम पवित्र स्थल) बोर्ड के साथ 1936 के अधिनियम के तहत पंजीकृत किया गया था। इस अवधि के दौरान मुसलमानों के उत्पीड़न की पृष्ठभूमि की क्रमशः 10 और 23 दिसम्बर 1949 की दो रिपोर्ट दर्ज करके वक्फ निरीक्षक मोहम्मद इब्राहिम द्वारा वक्फ बोर्ड के सचिव को दिया गया था।

पहली रिपोर्ट कहती है “मस्जिद की तरफ जानेवाले किसी भी मुस्लिम टोका गया और नाम वगैरह लिया गया। वहां के लोगों ने मुझे बताया कि हिंदुओं से मस्जिद को खतरा है। जब नमाजी (नमाज अदा करने वाले) लौट कर जाने लगते है तो उनकी तरफ आसपास के घरों के जूते और पत्थर फेंके जाते हैं। मुसलमान भय के कारण एक शब्द भी नहीं कहते। रघुदास के बाद लोहिया ने अयोध्या का दौरा किया और वहां भाषण दिया … कब्र को नुकसान मत पहुंचाइए… बैरागियों ने कहा मस्जिद जन्मभूमि है और इसलिए इसे हमें दे दें… मैंने अयोध्या में एक रात बिताई और बैरागी जबरन मस्जिद पर कब्जा करने लगे… ..”

22 दिसम्बर 1949 की आधी रात को जब पुलिस गार्ड सो रहे थे, तब राम और सीता की मूर्तियों को चुपचाप मस्जिद में ले जाया गया और वहां स्थापित कर दिया गया। अगली सुबह इसकी खबर कांस्टेबल माता प्रसाद द्वारा दी गयी और अयोध्या पुलिस थाने में इसकी सूचना दर्ज की गयी। 23 दिसम्बर 1949 को अयोध्या पुलिस थाने में सब इंस्पेक्टर राम दुबे द्वारा प्राथमिकी दर्ज कराते हुए कहा गया: “50-60 व्यक्तियों के एक दल ने मस्जिद परिसर के गेट का ताला तोड़ने के बाद या दीवारों को फांद कर बाबरी मस्जिद में प्रवेश किया। . और वहां श्री भगवान की मूर्ति की स्थापना की तथा बाहरी और अंदरुनी दीवार पर गेरू (लाल दूमट) से सीता-राम का चित्र बनाया गया … उसके बाद, 5-6 हजार लोगों की भीड़ आसपास इकट्ठी हुई तथा भजन गाते और धार्मिक नारे लगाते हुए मस्जिद में प्रवेश करने की कोशिश करने लगी, लेकिन रोक दिए गए।” अगली सुबह, हिंदुओं की बड़ी भीड़ ने भगवानों को प्रसाद चढ़ाने के लिए मस्जिद में प्रवेश करने का प्रयास किया। जिला मजिस्ट्रेट के.के. नायर ने दर्ज किया है कि “यह भीड़ जबरन प्रवेश करने की कोशिश करने के लिए पूरी तरह से दृढ़ संकल्प थी। ताला तोड़ डाला गया और पुलिसवालों को धक्का देकर गिरा दिया गया। हममें से सब अधिकारियों और दूसरे लोगों ने किसी तरह भीड़ को पीछे की ओर खदेड़ा और फाटक को बंद किया। पुलिस और हथियारों की परवाह न करते हुए साधु एकदम से उन पर टूट पड़े और तब बहुत ही मुश्किल से हमलोगों ने किसी तरह से फाटक को बंद किया। फाटक सुरक्षित था और बाहर से लाये गए एक बहुत ही मजबूत ताले से उसे बंद कर दिया गया तथा पुलिस बल को सुदृढ़ किया गया (शाम 5:00 बजे).”

इस खबर को सुनकर प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने यूपी के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत को यह निर्देश दिया कि वे यह देखें कि देवताओं को हटा लिया जाए. पंत के आदेश के तहत मुख्य सचिव भगवान सहाय और फैजाबाद के पुलिस महानिरीक्षक वी.एन. लाहिड़ी ने देवताओं को हटा लेने के लिए फैजाबाद को तत्काल निर्देश भेजा. हालांकि, के.के. नायर को डर था कि हिंदू जवाबी कार्रवाई करेंगे और आदेश के पालन को अक्षम करने की पैरवी करेंगे।

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1984 में, विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने मस्जिद के ताले को खुलवाने के लिए बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू किया और 1985 में राजीव गांधी की सरकार ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ताला खोल देने का आदेश दिया। उस तारीख से पहले केवल हिन्दू आयोजन की अनुमति थी, जिसमें हिंदू पुरोहित मूर्तियों की सालाना पूजा करते थे। इस फैसले के बाद, सभी हिंदुओं को, जो इसे राम का जन्मस्थान मानते थे, वहां तक जाने की अनुमति मिल गयी और मस्जिद को एक हिंदू मंदिर के रूप में कुछ अधिकार मिल गया।

क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव तब बहुत अधिक बढ़ गया जब नवंबर 1989 में राष्ट्रीय चुनाव से पहले विहिप को विवादित स्थल पर शिलान्यास (नींव स्थापना समारोह) करने की अनुमति प्राप्त हो गई। वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने एक रथ पर सवार होकर दक्षिण से अयोध्या तक की 10,000 किमी की यात्रा की शुरूआत की।

विध्वंस कैसे किया गया

6 दिसम्बर 1992 भारत सरकार द्वारा बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए बनी परिस्थितियों की जांच करने के लिए लिब्रहान आयोग का गठन किया गया। विभिन्न सरकारों द्वारा 48 बार अतिरिक्त समय की मंजूरी पाने वाला, भारतीय इतिहास में सबसे लंबे समय तक काम करनेवाला यह आयोग है। इस घटना के l6 सालों से भी अधिक समय के बाद 30 जून 2009 को आयोग ने प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंपी.

रिपोर्ट की सामग्री नवंबर 2009 को समाचार मीडिया में लीक हो गयी। मस्जिद के विध्वंस के लिए रिपोर्ट ने भारत सरकार के उच्च पदस्थ अधिकारियों और हिंदू राष्ट्रवादियों को दोषी ठहराया. इसकी सामग्री भारतीय संसद में हंगामे का कारण बनी।

6 दिसम्बर 1992 को कार सेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद विध्वंस के दिन जो कुछ भी हुआ था, लिब्रहान रिपोर्ट ने उन सिलसिलेवार घटनाओं के टुकड़ों कों एक साथ गूंथा था।

रविवार की सुबह लालकृष्ण आडवाणी और अन्य लोगों ने विनय कटियार के घर पर मुलाकात की। रिपोर्ट कहती है कि इसके बाद वे विवादित ढांचे के लिए रवाना हुए. आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और कटियार पूजा की वेदी पर पहुंचे, जहां प्रतीकात्मक रूप से कार सेवा होनी थी, फिर आडवाणी और जोशी ने अगले 20 मिनट तक तैयारियों का निरीक्षण किया। इसके बाद दोनो वरिष्ठ नेता 200 मीटर की दूरी पर राम कथा कुंज के लिए रवाना हो गए। यह वह इमारत है जो विवादित ढांचे के सामने थी, जहां वरिष्ठ नेताओं के लिए एक मंच का निर्माण किया गया था।

दोपहर में, एक किशोर कार सेवक कूद कर गुंबद के ऊपर पहुंच गया और उसने बाहरी घेरे को तोड़ देने का संकेत दिया। रिपोर्ट कहती है कि इस समय आडवाणी, जोशी और विजय राजे सिंधिया ने “… या तो गंभीरता से या मीडिया का लाभ उठाने के लिए कार सेवकों से उतर आने का औपचारिक अनुरोध किया। पवित्र स्थान के गर्भगृह में नहीं जाने या ढांचे को न तोड़ने की कार सेवकों से कोई अपील नहीं की गयी थी। रिपोर्ट कहती है: “नेताओं के ऐसे चुनिंदा कार्य विवादित ढांचे के विध्‍वंस को पूरा करने के उन सबके भीतर छिपे के इरादों का खुलासा करते हैं

रिपोर्ट का मानना है कि “राम कथा कुंज में मौजूद आंदोलन के प्रतीक … तक बहुत ही आसानी से पहुंच कर … विध्वंस को रोक सकते थे।”

विध्वंस करने की योजना बनाई गई

पूर्व खुफिया ब्यूरो (आईबी) के संयुक्त निदेशक मलय कृष्ण धर ने 2005 की एक पुस्तक में दावा किया कि बाबरी मस्जिद विध्वंस की योजना 10 महीने पहले आरएसएस, भाजपा और विहिप के शीर्ष नेताओं द्वारा बनाई गई थी और इन लोगों ने इस मसले पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव द्वारा उठाये गए कदम पर सवाल उठाया था। धर ने दावा किया है कि भाजपा/संघ परिवार की एक महत्वपूर्ण बैठक की रिपोर्ट तैयार करने का प्रबंध करने का उन्हें निर्देश दिया गया था और उस बैठक ने “इस शक की गुंजाइश को परे कर दिया कि उनलोगों (आरएसएस, भाजपा, विहिप) ने आनेवाले महीने में हिंदुत्व हमले का खाका तैयार किया और दिसंबर 1992 में अयोध्या में ‘प्रलय नृत्य’ (विनाश का नृत्य) का निर्देशन किया।.. बैठक में मौजूद आरएसएस, भाजपा, विहिप और बजरंग दल के नेता काम को योजनाबद्ध रूप से अंजाम देने की बात पर आपसी सहमति से तैयार हो गए।” उनका दावा है कि बैठक के टेप को उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अपने बॉस के सुपुर्द किया, उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा कि उन्हें इसमें कोई शक नहीं है कि उनके बॉस ने उस टेप की सामग्री को प्रधानमंत्री (राव) और गृह मंत्री (एसबी चव्हाण) को दिखाया. लेखक ने दावा किया है कि यहां एक मूक समझौता हुआ था जिसमें अयोध्या ने उन्हें “राजनीतिक लाभ उठाने के लिए हिंदुत्व की लहर को शिखर पर पहुंचाने का एक अद्भुत अवसर” प्रदान किया।

आज की कुछ घटनाओं को देख कर ये सवाल उठते हैं की क्या 2019 लोकसभा आने के पहले अयोध्या में 1992 रिपीट की जा रही है i मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ __

  • बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी राम मंदिर पर बड़ा बयान दिया है. अमित शाह ने कहा है कि राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट को जल्द से जल्द फैसला लेना चाहिए, ताकि मंदिर निर्माण का काम जल्द शुरु हो सके.
  • https://aajtak.intoday.in/story/param-dharam-sansad-verdict-the-ram-temple-construction-will-start-from-feb-21-1-1058035.html
  • लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे पास आ रहा है, वैसे-वैसे राम मंदिर का मुद्दा भी गर्म होता जा रहा है. उत्तर प्रदेश में प्रयागराज कुंभ की धर्म संसद में राम मंदिर को लेकर एक प्रस्ताव पास किया गया है. इस प्रस्ताव के मुताबिक शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने एलान किया है कि साधु-संत दस फरवरी के बाद अयोध्या कूच करेंगे और 21 फरवरी को राम मंदिर की पहली ईंट रखेंगे.
  • धर्म संसद में कहा गया है कि 10 फरवरी यानी बसंत पंचमी के बाद साधु संत प्रयागराज से अयोध्या के लिए कूच करना शुरू करेंगे और 21 फरवरी को राम जन्मभूमि में पहली ईंट रखी जाएगी. इतना ही नहीं धर्म संसद में यह भी कहा गया है कि 21 फरवरी से राम मंदिर बनने तक सविनय अवज्ञा आंदोलन किया जाएगा और अगर इस बीच कोई रोकता है तो साधु संत गोली खाने के लिए भी तैयार हैं.
  • मोदी सरकार ने राम मंदिर पर बड़ा दांव खेला. सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी है कि अयोध्या में विवादित जमीन के आसपास की गैर-विवादित जमीन उसके मालिकों को लौटा दी जाए. इस अर्जी के पीछे मंशा ये दिख रही है कि अयोध्या में उस जमीन पर निर्माण शुरू हो सके जिस पर विवाद नहीं है.

अब आप समझे जो पहले बाबरी मस्जिद को शहीद किया ,वही लोग आज सत्ता पर आसीन हैं ,आखिर केन्द्र सरकार राम मन्दिर कि अप्लिकेसन लेकर सुप्रिम कोर्ट क्यों गयी ,क्युकी एक एप्लीकेशन देने से राम मंदिर का केस और लम्बा होगा ,ये बात सरकार जानती है ,फिर भी__इसका मुख्य वजह है राजनीती ,वह इसलिए की बीजेपी जान चुकी है की 2019 लोकसभा जितंना मुश्किल है और इसलिए राम भक्तो को इस एप्लीकेशन में फंसा कर ,टोटल इल्जाम सुप्रीम कोर्ट पर डाल देना चाहती ,और जनता से कहेगी की हम पूरी कोशिस कर रहे पर सुप्रीम कोर्ट नहीं चाह रही__और इसीकारण बीजेपी बैकफुट पर आ चुकी है ,

साधुसंत के माध्यम से दंगे भी हो सकते हैं,बीजेपी करवा सकती है पर साधु संत अनजान है,क्युकी आज ही एक रिपोर्ट आयी है जिसमे दंगों का जिक्र है।

मेरा ऐसा मनना है की हम सभी भारतवासियों को भारत के संबिधान को लेकर चलना चाहिए ,और सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला होगा राम मंदिर पर उसे हमें मनना चाहिए ,अगर इसके अलावा कुछ करते हैं अयोध्या मेंतो ये देशहित में नहीं होगा ,इसे संबिधान का उलंघन माना जायेगा ,इसलिए आप बीजेपी हित में नहीं देश हित में सोंचें क्योकि देश को बचाना हर भारतवासी का फ़र्ज़ है जय हिन्द ।

मो शेर अली, यूथ की आवाज


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