जानिये दुनिया की सबसे खतरनाक खुफिया एजेंसी मोसाद के बारे मे

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इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू आजकल भारत के दौरे पर हैं. लेकिन पता नहीं ये बात कितने लोग जानते हैं कि उनके प्रधानमंत्री बनने में उनके बड़े भाई योनतन नेतन्याहू का बहुत बड़ा हाथ रहा है. दुनिया की सबसे खतरनाक खुफिया एजेंसी मोसाद और इजराइली फोर्स का हिस्सा रहे योनतन नेतन्याहू उस ऑपरेशन थंडरबोल्ट में शामिल थे जिसे दुनिया का अब तक का सबसे खतरनाक हवाई ऑपरेशन माना जाता है.

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ऑपरेशन थंडरबोल्टः जब दुनिया ने जानी मोसाद की ताकत इस घटना ने पूरी दुनिया को मोसाद का लोहा मानने पर मजबूर कर दिया था इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू आजकल भारत के दौरे पर हैं. लेकिन पता नहीं ये बात कितने लोग जानते हैं कि उनके प्रधानमंत्री बनने में उनके बड़े भाई योनतन नेतन्याहू का बहुत बड़ा हाथ रहा है. दुनिया की सबसे खतरनाक खुफिया एजेंसी मोसाद और इजराइली फोर्स का हिस्सा रहे योनतन नेतन्याहू उस ऑपरेशन थंडरबोल्ट में शामिल थे जिसे दुनिया का अब तक का सबसे खतरनाक हवाई ऑपरेशन माना जाता है. इजराइल से उड़े एक विमान को अपहरण कर लिया जाता है. इसके बाद विमान को युगांडा में उतारा जाता है. जहां का तानाशाह खूंखार ईदी अमीन अपहर्ताओं के समर्थन में था. विमान में सवार इजराइली नागरिकों को छुड़ाना था. वो भी दुश्मन देश मे घुस कर. काम लगभग नामुमकिन था. मगर मोसाद और इजराइली कमांडो के करीब सौ लोगों के दस्ते ने सिर्फ सौ फीट की ऊंचाई पर प्लेन उड़ा कर उस रात जो कारनामा कर दिखाया उसकी मिसाल आज भी दुनिया में दी जाती है. 27 जून 1976, बेनगुरियन इंटरनेशनल एयरपोर्ट, तेल अवीव, इजराइल रात के 11 बजे एयर फ्रांस की एयरबस ए300 वी4-203 इजराइली शहर तेल अवीव से ग्रीस की राजधानी एथेंस के लिए उड़ान भरती है. विमान में कुल 246 मसाफिर और 12 क्रू मेंबर सवार थे. ज्यादातर मुसाफिर यहूदी और इजराइली नागरिक थे. एथेंस इंटरनेशनल एयरपोर्ट, रात 12.30 बजे करीब डेढ़ घंटे की उड़ान के बाद प्लेन एथेंस पहुंचता है. अब विमान को यहां से पेरिस के लिए उड़ान भरना था. एथेंस में विमान में 58 और मुसाफिर सवार होते हैं. इन्हीं 58 मुसाफिरों में से वो चार आतंकवादी भी थे, जिन्हें इस प्लेन को हाईजैक करना था. इन चार आतंकवादियों में से दो फिलिस्तीनी लिब्रेशन गुट से थे जबकि बाकी दो जर्मन के रेवोल्यूशनरी सेल से जुड़े थे. रात ठीक साढ़े बारह बजे विमान के टेकऑफ करते ही अचानक चारों प्लेन को हाईजैक कर लेते हैं. इनमें से एक आतंकवादी कॉकपिट में घुस जाता है और को-पायलट को बाहर निकाल कर खुद उस सीट पर बैठ जाता है. पायलट और सभी मुसाफिर अब उनके कब्जे में थे. प्लेन पर कब्जा करने के बाद हाइजैकर पेरिस की बजाए विमान को लीबिया के शहर बेंगहाजी ले जाते हैं. बेंगहाजी में विमान में ईंधन भरा जाता है. इस दौरान अपहर्ता विमान में सवार ब्रिटेन में पैदा हुई एक इजराइली महिला को बीमार होने की वजह से रिहा कर देते हैं. बेंगहाजी में करीब सात घंटे तक रुकने के बाद विमान एक बार फिर उड़ान भरता है. हाईडजैकर्स के इशारे पर इस बार विमान का रुख अफ्रीकी देश युगांडा की तरफ था. 28 जून 1976, दोपहर 3.15 बजे, एंटबी एयरपोर्ट, युगांडा अब मामला सचमुच खतरनाक हो गया था. क्योंकि युगांडा की जिस सरजमीन पर विमान उतारा गया खुद वहां का तानाशाह ईदी अमीन इन फिलिस्तीनी आतंकवादियों के समर्थन में खड़ा था. और इससे पहले कि इजरायली कुछ सोच पाते आतंकवादियों के समर्थन में युगांडा की आर्मी ने एंटबी एयरपोर्ट को चारों तरफ से घेर लिया. मकसद था किसी भी रेस्क्यू ऑपरेशन को शुरू होने से पहले ही खत्म कर देना. एंटबी एयरपोर्ट पर युगांडा की सेना के करीब 100 जवान मौजूद थे जिन्होंने पूरे एयरपोर्ट के अपने घरे में ले रखा था. इसके बाद विमान से एक-एक कर सारे मुसाफिरों को नीचे उतारा जाता है और उन्हें एयरपोर्ट के ही उस ट्रांजिट हॉल में ले जाया जाता है, जो फिलहाल इस्तेमाल में नहीं था. अब तक करीब चौबीस घंटे गुजर चुके थे और विमान के हाईजैक होने की खबर दुनिया भर में फैल चुकी थी. इस पूरी हाईजैकिंग की जानकारी ना सिर्फ ईदी अमीन को थी बल्कि अपरहर्ताओं को उसका खुला समर्थन भी था. कहते हैं कि ईदी अमीन हर रोज़ खुद एंटबी एयरपोर्ट आता था और सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेता था. 28 जून 1976, एंटबी एयरपोर्ट, युगांडा विमान हाईजैक करने के बाद पहली बार हाईजकैर्स ने अपनी मांग रखी. हाइजैकर्स का मकसद था इजरायल की जेलों में बंद 40 फिलिस्तीनी आतंकवादियों को छुड़ाना. इसके अलावा आतंकवादी कीनिया, फ्रांस, स्विट्जरलैंड और वेस्ट जर्मनी की जेलों में बंद अपने तेरह और साथियों की भी रिहाई चाहते थे. कुल 53 आतंकवागदियों की रिहाई के साथ-साथ उन्होंने पांच मीलियन अमेरिकी डॉलर की भी मांग रखी. मांग ना माने जाने की सूरत में आतंकवादियों ने बंधक बनाए गये यात्रियों को एक जुलाई 1976 की सुबह से एक एक कर मार डालने की धमकी दी। यानी इजरायल सरकार कों मांगें मानने के लिए सिर्फ 48 घंटों का वक्त दिया गया. 29 जून 1976, एंटबी एयरपोर्ट, युगांडा यूगांडा की सेना एयरपोर्ट के ट्रांजिट हॉल में कैद मुसाफिरों को दो ग्रुप में बांट देती है. जितने गैर इजराइली नागरिक थे उन्हें एयरपोर्ट के ही वेटिंग हॉल में ले जाकर कैद कर दिया जाता है. जबकि एयर फ्रांस क्रू के 12 मेंबर और कुल 94 इजराइली नागरिकों को एक साथ उसी ट्राजिट ह़ॉल में कैद रखा जाता है. 30 जून 1976, एंटबी एयरपोर्ट, युगांडा मांगें माने जाने की मोहलत का आखिरी दिन खत्म होने जा रहा था. इसी बीच हाईजैकर्स गैर इजराइली बंधकों में से 48 मुसाफिरों को रिहा कर देते हैं. इनमें से ज्यादातक बुजुर्ग और बीमार थे. इन सभी मुसाफिरों को एक स्पेशल विमान से पेरिस भेज दिया जाता है. 1 जुलाई 1976, एंटबी एयरपोर्ट, युगांडा हाईजकैर्स की दी गई मोहलत खत्म होती उससे ठीक पहले इजराइली सरकार ने हाईजकैर्स तक पैगाम भिजवाया कि वो बातचीत के लिए तैयार है. पर उन्हें कुछ और मोहलत दी जाए. अपहर्ता इजराइली सरकार की बात मान लेते हैं और मांगे मानने की डेडलाइन 4 जुलाई 1976 की दोपहर तक बढ़ा देते हैं. इतना ही नहीं इसी के कुछ घंट बाद ही वो सौ और गैर इजराइली नागरिकों को रिहा कर देते हैं. इन सभी लोगों को भी स्पेशल विमान से पेरिस भेज दिया जाता है। अब एंटबी एयरपोर्ट के ट्रांजिट हॉल में सिर्फ 94 इजराइली नागरिक, फ्रांस के दस युवा मुसाफिर और एय़र फ्रांस के 12 क्रू मेंबर यानी कुल 116 मुसाफिर बचे थे. इजरायल की सरकार के लिये ये वक्त बेहद मुश्किल भरा था. क्योंकि न तो वो अपने नागरिकों और फ्लाइट के क्रू मेंबर्स को इस तरह मौत के मुंह में धकेल सकती थी और न ही आतंकवादियों की मांगें मान सकती थी. क्योंकि इजराइली सरकार का ये उसूल रहा है कि वो किसी भी कीमत पर आतंकवादियों से डील नहीं करेंगे. मगर इजराइल से इतनी दूर वो भी अपने दुश्मन मुल्क में घुस कर कैसे अपने नागरिकों को छुड़ाएं? ये काम लगभग नामुमिकन सा था. हाईजैकर्स की दी गई मोहलत नजदीक आती जा रही थी. इजराइली सरकार ने इस दौरान अपने मित्र अफ्रीकी देशों और दुनिया के बाकी मुल्कों से ईदी अमीन पर दबाव डाल कर बंधकों को रिहा करवाने की तमाम कोशिशें कीं. मगर बात नहीं बनी. हालांकि बातचीत के साथ ही इजराइली सरकार रेस्क्यू ऑपरेशन के जरिए बंधकों को रिहा कराने की तरकीब पर भी काम कर रही थी. 3 जुलाई 1976, इजराइल बंधकों की रिहाई के रास्ते बंद थे. लिहाजा तीन जुलाई की शाम साढ़े छह बजे इजराइली कैबिनेट ने आखिरी फैसला लिया. फैसला रेस्क्यू मिशन का. ब्रिगेडियर जेनरल डान शोमरोन को ऑपरेशन का कमांडर बनाया गया. प्लान बेहद जोखिम भरा था. क्योंकि ये दुनिया के किसी भी एयरपोर्ट पर अब तक का सबसे बड़ा और खतरनाक रेस्क्यू ऑपरेशन था. इजराइली कमांडोज को ये मिशन बिजली की तेजी से पूरा करना था. लिहाजा इस ऑपरेशन को नाम दिया गया ऑपरेशन थंडरबोल्ट. इस दौरान इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद लगातार अपना काम कर रही थी. रिहा किए गए गैर इजराइली बंधकों से बातचीत के बाद मोसाद एंटबी एयरपोर्ट और उसके उस हिस्से के बारे में तमाम अहम जानकारी जुटा चुकी थी. जहां बंधकों को रखा गया था. इसके साथ ही हाईजैकर्स और युगांडा सेना की सही-सही तादाद भी पता लगा चुकी थी। इसी बीच मोसाद को पता चला कि 1960 और 70 के दौरान इजराइल की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी ने अफ्रीका के कई देशों में बहुत सी इमारतें बनाई थीं. यहां तक कि युगांडा के एंटबी एयरपोर्ट का वो टर्मिनल भी उसी कंपनी ने बनाया था. कंपनी के जिस इजराइली इंजीनियर ने वो टर्मिनल बनाया था उसकी मदद से मोसाद ने उस जगह का पूरा नक्शा बना लिया जहां बंधकों को रखा गया था. 3 जुलाई 1976, शर्म अल शेख, इजराइल प्लान के मुताबिक सौ इजराइली कमांडोज की एक टीम इजराइली एयर फोर्स के चार सी-130 हरकुलेस ट्रांसपोर्ट विमान से शर्म अल शेख एयरपोर्ट से युगांडा के एंटबी के लिए उड़ान भरती है. इन खास विमानों में काले रंग की एक मर्सिडीज कार और लैंड रोवर कारें भी थीं. दरअसल मोसाद ने पता लगाया था कि ईदी अमीन काले रंग की मर्सिडीज का शौकीन है और हमेशा उसी कार में बाहर निकलता है. जबकि उसके साथ खास सुरक्षा दस्ता लैंड रोवर कार में होता है. तरकीब ये थी कि एयरपोर्ट पर उतरते ही इन्हीं कारों में टर्मिनल की तरफ कूच किय़ा जाएगा. ताकि युगांडा की सेना को लगे कि ईदी अमीन का काफिला है और वो आसानी से टर्मिनल में दखिल हो जाएं. लेकिन खामोशी के साथ एंटबी एयरपोर्ट पर चार-चार प्लेन को लैंड कराना आसान नहीं था. युगांडा की एयर स्पेस में चोरी-छुपे घुसना था. बिना एंटबी एयर ट्रैफिक कंट्रोल की जानकारी के और ये तभी मुमकिन था, जब विमान बेहद कम ऊंचाई पर उड़े. तीस मीटर यानी सौ फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर नहीं. इजराइली एयरफोर्स के चार कारगो विमान के साथ दो बोइंग 707 विमान ने भी उड़ान भरी. पहला बोइंग जिसमें मेडिकल टीम मौजूद थी वो नेरौबी एयरपोर्ट पर रुक गया. जबकि दूसरे बोइंग को बंधकों को वापस लाने के लिए एंटबी एयरपोर्ट पर ही उतरना था. 3 जुलाई 1976, एंटबी एयरपोर्ट, य़ुगांडा, रात 11 बजे ठीक यही वक्त था जब इजराइली एयरफोर्स के चार विमान बेहद नीची उड़ान भरते हुए और एंटबी एयरपोर्ट के ट्रैफिक कंट्रोल को धोखा देते हुए रनवे पर उतर पड़ते हैं. रात के अंधेरे में चारों विमान को एयरपोर्ट पर कुछ इस तरह उतारा गया था कि वहां मौजूद युगांडा आर्मी और आतंकवादियों को खबर तक नहीं लगी. विमान का कारगो द्वार पहले से खुला था. एक-एक कर मर्सिडीज और लैंड रोवर कारें रनवे पर उतर आती हैं. उनमें पहले से ही कमांडोज बैठे थे. सौ इजरायली कमांडोज की इस क्रैक टीम को तीन हिस्सों में बांटा गया था. इनमें से एक टीम को एयरपोर्ट के टर्मिनल में बंधक बना कर रखे गये मुसाफिरों को छुड़ाने का काम सौंपा गया. जबकि दूसरी टीम को एयरपोर्ट के रनवे पर घात लगा कर बैठी युगांडा की आर्मी और आतंकवादियों का मुकाबला करना था. और तीसरी टीम की जिम्मेदारी थी छुड़ाए गए मुसाफिरों को साथ लाए खाली जहाज में बैठाना. इमारत में घुसते ही गोलियां चलनी शुरू हो गई. इजरायली कमांडो माइक पर इंग्लिश और हिब्रू में चिल्ला रहे थे कि “हम इजरायली सैनिक हैं, लेट जाओ लेट जाओ.” कमांडों ने 3 अपहरणकर्ताओं को गोली मार दी. तभी एक 19 साल फ्रेंच लडका खडा हो गया. कमांडो ने उसे अपहरणकर्ता समझा और गोली मार दी. इसके अलावा दो और बंधक भी क्रोस फायरिंग में मारे गए. कमांडोज़ को देखकर 3 अपहरणकर्ता एक दूसरे कमरे में छिप गए. मगर इज़रायली कमांडोज़ ने उस कमरे में ग्रेनेड फेंके और गोलियों की बौछार कर दी. तीनों मारे गए. इजरायली कमांडोज ने अपने इस प्लान को बखूबी निभाया. सबसे पहले उन्होंने बंधकों को अपने घेरे में लिया. दूसरी टीम युगांडा की सेना पर टूट पड़ी. महज आधे घंटे के अंदर सभी हाइजैकर्स को खत्म कर यात्रियों को सुरक्षित प्लेन तक पहुंचा दिया. इस पूरी कार्रवाई का जायजा हवाई अड्डे के ऊपर चक्कर काट रहे एक पांचवें हवाई जहाज में बैठे ऑपरेशन के कमांडर, जनरल ऐडम खुद ले रहे थे. इस ऑपरेशन में सात हाईजैकर्स, और युगांडा की सेना के 48 जवान मारे गए. जबकि एयरपोर्ट पर खड़े युगांडा के करीब 30 विमानों को भी जाते-जाते इरजाइली कमांडों ने तबाह कर दिया. ताकि कोई उनका पीछा ना कर सके. क्रास फायरिंग में तीन इजराइली बंधकों की भी मौत हो गई जबकि पांच कमांडो घायल हुए. ऑपरेशन में इजराइली यूनिट कमांडर योनतन नेतन्याहू की मौत हो गई. योनतन नेतन्याहू इजराइल के मौजूदा प्राधनमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बड़े भाई थे. 53 मिनट का ऑपरेशन, 30 मिनट कमांडो कार्रवाई इस पूरे ऑपरेशन के दौरान मोसाद को सिर्फ यही एक जान का नुकसान हुआ. हालांकि 10 कमांडो घायल भी हुए. विदेशी ज़मीन पर मोसाद का ये पूरा ऑपरेशन महज़ 53 मिनट चला और जिसमें से 30 मिनट तक कमांडो कार्रवाई चली. युगांडा के तानाशाह इदी अमीन के लिए यह खून का घूंट पीने जैसा था. उसे यकीन ही नहीं हुआ कि कोई उनके देश में घुस कर अपने नागरिकों को छुडा कर ले जा सकता है।

साभार आजतक


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