सावरकर मरते दम तक अग्रेंजों की गुलामी करता रहा, और उसके भक्त देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहें हैं

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भारतीय जनता पार्टी जिसको वीर कहकर हीरो बनाने की राजनीति करती है, क्या कोई ऐसा इंसान जिसने अंग्रेज़ों के सामने ना सिर्फ माफी मांगी बल्कि ब्रिटिश सरकार का एजेंट बनकर आज़ादी के दिवानों को जेलों मे डलवाया। क्या कोई ऐसा इंसान देश का हीरो हो सकता है जिसने साज़िश करके राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी की हत्या करवाई।

क्या यह इंसान देश का हीरो हो सकता है जिसने ना देश के सविंधान को माना और ना ही तिरंगे को। सावरकर ने कभी देश के संविधान तक को नहीं माना। क्या ऐसा घर्णातमक इंसान वीर कहलाने के लायक हो सकता है ? जो कार्य सावरकर गोवलकर हेडगवार करना चाहते थे, आज वही काम बीजेपी सरकार करना चाहती है। प्रधानमंत्री बनने से पहले मुख्यमंत्री रहने के दौरान नरेंद्र मोदी ने जुलाई, 2013 में रॉयटर्स न्यूज़ एजेंसी के दो पत्रकारों को दिए एक इंटरव्यू में खुद को हिन्दू राष्ट्रवादी बताया था।

भारत में राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन का परस्पर अटूट संबंध है। राष्ट्रीयता भारत के स्वाधीनता आंदोलन की वह भावना थी, जो पूरे आंदोलन के मूल में थी। इसी दौरान हिंदू राष्ट्रीयता अथवा हिंदू राष्ट्रवाद का विचार गढ़ा गया। सावरकर उस हिंदुत्व के जन्मदाता हैं जो हिंदू और मुसलमानों में फूट डालने वाला साबित हुआ। मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र के सिद्धांत की तरह ही उनके हिंदुत्व ने भी अंग्रेजों की ‘बांटो और राज करो’ नीति में सहायता की।

राजनीति शास्त्री और प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम लिखते हैं, “हिंदू राष्ट्रवादी शब्द की उत्पत्ति ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक ऐतिहासिक संदर्भ में हुई। यह स्वतंत्रता संग्राम मुख्य रूप से एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए काँग्रेस के नेतृत्व में लड़ा गया था।

‘मुस्लिम राष्ट्रवादियों’ ने मुस्लिम लीग के बैनर तले और ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ ने ‘हिंदू महासभा’ और ‘आरएसएस’ के बैनर तले इस स्वतंत्रता संग्राम का यह कहकर विरोध किया कि हिंदू और मुस्लिम दो पृथक राष्ट्र हैं। स्वतंत्रता संग्राम को विफल करने के लिए इन हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवादियों ने अपने औपनिवेशिक आकाओं से हाथ मिला लिया ताकि वे अपनी पसंद के धार्मिक राज्य ‘हिंदुस्थान’ या ‘हिंदू राष्ट्र’ और पाकिस्तान या इस्लामी राष्ट्र हासिल कर सकें।

नरेंद्र मोदी के इस साक्षात्कार के बाद प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम ने नरेंद्र मोदी के नाम एक खुला खत लिखा था, जिसमें वे लिखते हैं, “भारत को विभाजित करने में मुस्लिम लीग की भूमिका और इसकी राजनीति के विषय में लोग अच्छी तरह परिचित हैं लेकिन मुझे लगता है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ ने कैसा घटिया और कुटिल रोल अदा किया इसके विषय में आपकी याददाश्त को ताज़ा करना ज़रूरी है।”

उस पत्र के मुताबिक, ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ मुस्लिम लीग की तरह ही द्विराष्ट्र सिद्धांत में यकीन रखते हैं। हिंदुत्व के जन्मदाता, वीडी सावरकर और आरएसएस दोनों की द्विराष्ट्र सिद्धांत में साफ-साफ समझ में आने वाली आस्था रही है कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग राष्ट्र हैं। मुहम्मद अली जिन्नाह के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने 1940 में भारत के मुसलमानों के लिए पाकिस्तान की शक्ल में पृथक होमलैंड की मांग का प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन सावरकर ने तो उससे काफी पहले 1937 में ही जब वे अहमदाबाद में हिंदू महासभा के 19वें अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण कर रहे थे, तभी उन्होंने घोषणा कर दी थी कि हिंदू और मुसलमान दो पृथक राष्ट्र हैं।

शम्सुल इस्लाम उक्त पत्र में सावरकर के समग्र वांड्मय से उनके विचार उद्घृत करते हैं, ‘फिलहाल भारत में दो प्रतिद्वंदी राष्ट्र अगल-बगल रह रहे हैं। कई अपरिपक्व राजनीतिज्ञ यह मान कर गंभीर गलती कर बैठते हैं कि हिन्दुस्तान पहले से ही एक सद्भावपूर्ण राष्ट्र के रूप में ढल गया है या केवल हमारी इच्छा होने से इस रूप में ढल जाएगा। इस प्रकार के हमारे नेक नियत वाले पर कच्ची सोच वाले दोस्त मात्र सपनों को सच्चाई में बदलना चाहते हैं। इसलिए वे सांप्रदायिक उलझनों से अधीर हो उठते हैं और इसके लिए सांप्रदायिक संगठनों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं लेकिन ठोस तथ्य यह है कि तथाकथित सांप्रदायिक प्रश्न और कुछ नहीं बल्कि सैकड़ों सालों से हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक और राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्विता के नतीजे में हम तक पहुंचे हैं। हमें इन तथ्यों का हिम्मत के साथ सामना करना चाहिए। आज यह कतई नहीं माना जा सकता कि हिंदुस्तान एकता में पिरोया हुआ राष्ट्र है। इसके विपरीत हिंदुस्तान में मुख्यतः दो राष्ट्र हैं, हिंदू और मुसलमान। सावरकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वह आदि विचारक हैं जो हिंदू-मुसलमान को दो अलग-अलग राष्ट्र मानते थे।

तब से बाद के वर्षों में भी संघ अपनी हिंदू राष्ट्र की कल्पना और हिंदू राष्ट्रवाद के विचार पर टिका हुआ है। इसके उलट संघ भारत-पाकिस्तान बंटवारे के लिए काँग्रेस, महात्मा गांधी और नेहरू को कोसता भी है। मौजूदा दौर में हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए वे लोग सबसे बड़े ‘गद्दार’ हैं जो सांप्रदायिकता के विरोध में हैं, जो सेक्युलर विचार को मानने वाले हैं। जैसा कि प्रधानमंत्री कह चुके हैं कि वे ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ हैं, यदि ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ होना गर्व की बात है तो गर्व एक समस्या खड़ी करता है। इसी तरह मुस्लिम राष्ट्रवादी, सिख राष्ट्रवादी और इसाई राष्ट्रवादी होंगे। इतने सारे राष्ट्रवादी ज़ाहिर है कि भारतीय राष्ट्रवाद के मुकाबले कई टुकड़ियों में एक खतरे के रूप में खड़े होंगे।

 इस हिंदू राष्ट्रवाद में गर्व करने जैसा क्या है जो भारत जैसे विविधता वाले राष्ट्र को एक ही ढर्रे पर ले जाने की वकालत करता है। हिंदू राष्ट्रवादियों ने आज़ादी की लड़ाई के वक्त भारतीय सेनानियों का साथ देने के बजाय अंग्रेज़ों के साथ हो गए और अंग्रेज़ों की तरफ से उन पर कार्रवाई ना करने का अभयदान मिला।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी और जापान की मदद से भारत को आज़ाद कराने का प्रयास किया था। इस दौरान ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मदद करने की जगह ब्रिटिश शासकों का साथ दिया। सावरकर ने ब्रिटिश साम्राज्य के लिए भारत में सैनिकों की भर्ती में मदद की। आगे चलकर सावरकर ने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाया जो हिंदू-मुस्लिमों में भेद पैदा करने में सहायक हुआ। वीर सावरकर समग्र वांड्मय के हवाले से शम्सुल इस्लाम लिखते हैं, “हिंदू राष्ट्रवादियों ने बजाय नेता जी की मदद करने के, नेताजी के मुक्ति संघर्ष को हराने में ब्रिटिश शासकों के हाथ मज़बूत किए।

हिंदू महासभा ने वीर सावरकर के नेतृत्व में ब्रिटिश फौजों में भर्ती के लिए शिविर लगाए। हिंदुत्ववादियों ने अंग्रेज़ शासकों के समक्ष मुकम्मल समर्पण कर दिया था जो वीर सावरकर के निम्न वक्तव्य से और भी साफ हो जाता है। “जहां तक भारत की सुरक्षा का सवाल है, हिंदू समाज को भारत सरकार के युद्ध संबंधी प्रयासों में सहानुभूतिपूर्ण सहयोग की भावना से बेहिचक जुड़ जाना चाहिए जब तक यह हिंदू हितों के फायदे में हो। हिंदुओं को बड़ी संख्या में थल सेना, नौसेना और वायुसेना में शामिल होना चाहिए और सभी आयुध, गोला-बारूद और जंग का सामान बनाने वाले कारखानों वगैरह में प्रवेश करना चाहिए।”

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सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू अपने एक लेख में लिखते हैं, “कई लोग मानते हैं कि सावरकर एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे लेकिन सच क्या है ? सच ये है ब्रिटिश राज के दौरान कई राष्ट्रवादी गिरफ्तार किए गए। जेल में ब्रिटिश अधिकारी उन्हें प्रलोभन देते थे कि या वे उनके साथ मिल जाएं या पूरी ज़िंदगी जेल में बिताएं। तब कई लोग ब्रिटिश शासन का सहयोगी बन जाने के लिए तैयार हो जाते थे। इसमें सावरकर भी शामिल हैं।” जस्टिस काटजू के मुताबिक सावरकर केवल 1910 तक राष्ट्रवादी रहे। यह वो समय था जब वे गिरफ्तार किए गए थे और उन्हें उम्र कैद की सज़ा हुई।

जेल में करीब दस साल गुज़ारने के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने उनके सामने सहयोगी बन जाने का प्रस्ताव रखा जिसे सावरकर ने स्वीकार कर लिया। जेल से बाहर आने के बाद सावरकर हिंदू सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने का काम करने लगे और एक ब्रिटिश एजेंट बन गए। वह ब्रिटिश नीति ‘बांटो और राज़ करो’ को आगे बढ़ाने का काम करते थे। जस्टिस काटजू लिखते हैं, “दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सावरकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे। उन्होंने तब इस नारे को बढ़ावा दिया, ‘राजनीति को हिंदू रूप दो और हिंदुओं का सैन्यीकरण करो।’

 सावरकर ने भारत में ब्रिटिश शासन द्वारा युद्ध के लिए हिंदुओं को सैन्य प्रशिक्षण देने की मांग का भी समर्थन किया था। बकौल जस्टिस काटजू, “इसके बाद जब काँग्रेस ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की तब सावरकर ने उसकी आलोचना की। उन्होंने हिंदुओं से ब्रिटिश सरकार की अवज्ञा ना करने को कहा। साथ ही उन्होंने हिंदुओं से कहा कि वे सेना में भर्ती हों और युद्ध की कला सीखें। क्या सावरकर सम्मान के लायक हैं और उन्हें स्वतंत्रता सेनानी कहा जाना चाहिए? सावरकर के बारे में ‘वीर’ जैसी बात क्यों? वह तो 1910 के बाद ब्रिटिश एजेंट हो गए थे।”

शम्सुल इस्लाम वीर सावरकर के हिंदुत्व की चर्चा करते हुए लिखते हैं, “वास्तव में आरएसएस ‘वीर’ सावरकर द्वारा निर्धारित विचारधारा का पालन करता है। यह कोई राज़ नहीं है कि वीर सावरकर अपने पूरे जीवन में जातिवाद और मनुस्मृति की पूजा के एक बड़े प्रस्तावक बने रहे। ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ की इस प्रेरणा के अनुसार ‘मनुस्मृति एक ऐसा धर्मग्रंथ है जो हमारे हिंदू राष्ट्र के लिए वेदों के बाद सर्वाधिक पूजनीय है और जो प्राचीन काल से ही हमारी संस्कृति रीति-रिवाज़, विचार तथा आचरण का आधार हो गया है। सदियों से इस पुस्तक ने हमारे राष्ट्र के आध्यात्मिक एवं दैविक अभियान को संहिताबद्ध किया है। आज भी करोड़ों हिंदू अपने जीवन तथा आचरण में जिन नियमों का पालन करते हैं, वे मनुस्मृति पर आधारित हैं। आज मनुस्मृति हिंदू विधि है।”

नाथूराम गोडसे ने 1948 में महात्मा गाँधी की गोली मारकर हत्या कर दी। पूरे महाद्वीप को हिला देने वाली इस हत्या के आठ आरोपी थे जिनमें से एक नाम वी डी सावरकर का भी था। हालांकि उनके खिलाफ यह आरोप साबित नहीं हो सका और वे बरी हो गए।

1910-11 तक वे क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल थे। वे पकड़े गए और 1911 में उन्हें अंडमान की कुख्यात जेल में डाल दिया गया। उन्हें 50 वर्षों की सज़ा हुई थी लेकिन सज़ा शुरू होने के कुछ महीनों में ही उन्होंने अंग्रेज़ सरकार के समक्ष याचिका डाली कि उन्हें रिहा कर दिया जाए। इसके बाद उन्होंने कई याचिकाएं लगाईं। अपनी याचिका में उन्होंने अंग्रेज़ों से यह वादा किया कि यदि मुझे छोड़ दिया जाए तो मैं भारत के स्वतंत्रता संग्राम से खुद को अलग कर लूंगा और ब्रिट्रिश सरकार के प्रति अपनी वफादारी निभाउंगा। अंडमान जेल से छूटने के बाद उन्होंने यह वादा निभाया भी और कभी किसी क्रांतिकारी गतिविधि में ना शामिल हुए और ना ही पकड़े गए। वीडी सावरकर ने 1913 में एक याचिका दाखिल की जिसमें उन्होंने अपने साथ हो रहे तमाम सलूक का ज़िक्र किया और अंत में लिखा, “हुजूर, मैं आपको फिर से याद दिलाना चाहता हूं कि आप दयालुता दिखाते हुए सज़ा माफ़ी की मेरी 1911 में भेजी गई याचिका पर पुनर्विचार करें और इसे भारत सरकार को फॉरवर्ड करने की अनुशंसा करें। भारतीय राजनीति के ताज़ा घटनाक्रमों और सबको साथ लेकर चलने की सरकार की नीतियों ने संविधानवादी रास्ते को एक बार फिर खोल दिया है। अब भारत और मानवता की भलाई चाहने वाला कोई भी व्यक्ति, अंधा होकर उन कांटों से भरी राहों पर नहीं चलेगा, जैसा कि 1906-07 की नाउम्मीदी और उत्तेजना से भरे वातावरण ने हमें शांति और तरक्की के रास्ते से भटका दिया था।”

अपनी याचिका में सावरकर लिखते हैं, “अगर सरकार अपनी असीम भलमनसाहत और दयालुता में मुझे रिहा करती है, मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि मैं संविधानवादी विकास का सबसे कट्टर समर्थक रहूंगा और अंग्रेज़ी सरकार के प्रति वफादार रहूंगा, जो कि विकास की सबसे पहली शर्त है। जब तक हम जेल में हैं, तब तक महामहिम के सैकड़ों-हज़ारों वफादार प्रजा के घरों में असली हर्ष और सुख नहीं आ सकता, क्योंकि खून के रिश्ते से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता। अगर हमें रिहा कर दिया जाता है तह लोग खुशी और कृतज्ञता के साथ सरकार के पक्ष में जो सज़ा देने और बदला लेने से ज़्यादा माफ करना और सुधारना जानती है, नारे लगाएंगे।”

याचिका के अगले हिस्से में वे और भारतीयों को भी सरकार के पक्ष में लाने का वादा करते हुए लिखते हैं, “इससे भी बढ़कर संविधानवादी रास्ते में मेरा धर्म-परिवर्तन भारत और भारत से बाहर रह रहे उन सभी भटके हुए नौजवानों को सही रास्ते पर लाएगा, जो कभी मुझे अपने पथ-प्रदर्शक के तौर पर देखते थे। मैं भारत सरकार जैसा चाहे उस रूप में सेवा करने के लिए तैयार हूं, क्योंकि जैसे मेरा यह रूपांतरण अंतरात्मा की पुकार है, उसी तरह से मेरा भविष्य का व्यवहार भी होगा। मुझे जेल में रखने से आपको होने वाला फायदा मुझे जेल से रिहा करने से होने वाले फायदे की तुलना में कुछ भी नहीं है।

जो ताकतवर है, वही दयालु हो सकता है और एक होनहार पुत्र सरकार के दरवाज़े के अलावा और कहां लौट सकता है। आशा है, हुजूर मेरी याचनाओं पर दयालुता से विचार करेंगे।

ऐसी गतिविधियों में लिप्त और दया की मांग करता हुआ ऐसा माफीनामा डालने वाले सावरकर वीर कैसे कहे जा सकते हैं, जिन्होंने सुभाष चंद्र बोस के उलट अंग्रेज़ी फौज के लिए भारतीयों की भर्ती में मदद की? सावरकर का योगदान यही है कि उन्होंने भारत में हिंदुत्व की वह विचारधारा दी जो लोकतंत्र के उलट एक धर्म के वर्चस्व की वकालत करती है। आज देश को देश भक्ति का पाठ वह लोग पढा  जो खुद देश द्रोहियों की पूजा करते हैं।

https://satyagrah.scroll.in/article/100842/was-veer-savarkar-really-all-that-brave

http://thewirehindi.com/9830/vinayak-damodar-savarkar-rss-and-freedom-movement/

मैं एक भारतीय मुसलमान हूँं और मुझे अपने भारतीय होने पर गर्व है। मैं मुल्क से प्यार करता हूँं और मुझे इस जज़्बे को साबित करने के लिए किसी से सर्टिफिकेट नहीं चाहिए। मैं और मेरे जैसे भारतीय मुसलमान अपने देश से प्यार करते है और हमेशा करते रहेंगे। अगर कोई मुस्लिम इस देश से गद्दारी करे तो उसे जीने का कोई हक नहीं, क्योंकि इस देश से प्यार करते हैं और मेरा फर्ज़ है इसकी हिफाज़त करना। मरते दम तक…

मोहम्मद शेर अली


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