बिस्कुट बेचने वाला जब चैनल चलाने लगेगा तो वो बिकेगा ही, पुण्य प्रसून बाजपेयी को हटाने के लिए बीजेपी ने दिये 250 करोङ रुपये

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पुण्य प्रसून वाजपेयी को चैनल से हटाने की कीमत दी गई 250 करोड़। ये कीमत दी गई ताकि मोदी सरकार के हाहाहूती प्रचार अभियान के सामने देश की ज़मीनी हक़ीक़त आईना बन कर न खड़ी हो जाए। प्रसून और उनकी टीम यही ‘अपराध’ कर रही थी। सरकार के अपने आँकड़ों के आलोक में असली भारत में फैले अँधेरे को दिखा रही थी। सत्ता के शूटरों ने चैनल के मालिक के सामने ‘बंदूक और नोटों की गड्डी’ रख दी। मालिक ने गड्डी उठाई और पूरी टीम को जाने का फरमान सुना दिया। प्रसून ने 19 मार्च की सुबह जो ट्वीट किया वह सारी कहानी खुद कह रहा है।

बिस्कुट बेचते-बेचते चैनल चलाने का शौक पालने वाले लाला ने जीवन में ऐसी ‘डील’ कब पाई होगी। जितना लगाया उससे न जाने कितने गुना ज्यादा पाया। साथ में सत्ता की कृपा बोनस में मिली। कुछ महीने पहले प्रसून को इसी तरह एबीपी न्यूज़ से जाना पड़ा था। तब भी सौदेबाज़ी हुई थी। एबीपी में प्रसून का ‘मास्टर स्ट्रोक’ कार्यक्रम सरकार के लिए चुनौती बन गया था। प्रधानमंत्री मोदी अपने लाइव कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ की जिस चंद्रमणि की आय दोगुनी होने पर ताली बजा रहे थे, प्रसून ने अपने शो में दिखाया कि आय दोगुनी नहीं होने की बात झूठ है, सब सिखाया -पढ़ाया गया था। यह खबर सीधे मोदी की प्रतिष्ठा पर चोट थी। सत्ता बिलबिला उठी थी।

जनवरी के मध्य में प्रसून ने सूर्या समाचार ज्वाइन किया था। उनकी नई टीम ने 9 फरवरी को चैनल रीलांच किया। शुरुआत उसी चंद्रमणि की खबर से हुई जिसकी वजह से प्रसून को एबीपी से जाना पड़ा था। देखते ही देखते प्रसून का रोज़ाना नौ बजे रात प्रसारित होने वाला शो ‘जय हिंद’ लोकप्रिय होने लगा। चैनल में प्रसून की टीम के एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि महीने भर में चैनल की ग्रोथ साढ़े पाँच सौ गुना हुई। चैनल के यूट्यूब सब्सक्राइबर 250 से बढ़कर ढाई लाख हो गए। 18 मार्च को जब देश भर के चौकीदारों की हालत पर ‘जय हिंद’ प्रसारित हो रहा था तो सोशल मीडिया पर इसे लाइव देखने वाले टॉप के चैनलों से ज्यादा थी।

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यानी टीआरपी चार्ट से बाहर रहने वाला चैनल एक नई संभावना बन रहा था जहाँ देश के उस तबके की आवाज़ सुनाई पड़ रही थी जो शोषण और अन्याय का शिकार है। जिसकी जमीन लुूटी जा रही है, या जिसे रोजगार के वादों पर ठगा गया था। यह हाशिये के हस्तक्षेप की तरह था। साथ में पी.साईंनाथ और अशोक वाजपेयी जैसी हमारे समय की सुचिंतित आवाज़ें भी सुनाई पड़ रही थींं। लेकिन महज़ 38 दिन बाद पूरी टीम को मैनेजमेंट ने अलविदा कह दिया। 19 मार्च को सुबह करीब साढ़े दस बजे सबकी मेल बाक्स में यह पत्र गिरा-

आख़िर कोई चैनल जो इतनी तेज़ी से बढ़ रहा था, देश भर में पसंद किया जा रहा था उसकी गति उसका मालिक ही क्यों रोकेगा? अगर धंधे के लिहाज़ से भी देखें तो इस चुनावी मौसम में चैलन के सामने एक बड़ा ब्रांड बनने की पूरी संभावना थी जिसके लिए चैनल के लंबे अरसे से तरस रहा था। प्रसून के एक सहयोगी बताते हैं कि खुद मालिक ने प्रसून से संपर्क किया था। उन्हें हर संसाधन मुहैया कराने का आश्वासन दिया था। प्रसून उनके चैनल के चेहरे बन जाएँ , इसकी उन्होंने काफी कोशिश की थी। आखिरकार प्रसून राज़ी हो गए। फटाफट नया स्टूडियो बनने लगा, मशीनों और टेक्नोलॉजी पर खर्च होने लगा, लेकिन अचानक कुछ दिन पहले सब चीजों पर ब्रेक लगने लगा।

आखिर लाला किस दबाव में आ गया? यह दबाव डाला किसने? आखिर कोई लाला अपना धंधा खुद ही मंदा क्यों करेगा?

दरअसल, चैलन के मालिक बी.पी.अग्रवाल की राजनीतिक महात्वाकाँक्षाएँ छिपी हुई नहीं हैं। खबर ये भी है कि वे नोएडा से लोकसभा का टिकट चाहते थे। कई पार्टियों से संपर्क कर रहे थे, लेकिन बात बनी नहीं थी। प्रसून जैसे बड़े चेहरे को चैनल में लाकर वे अपनी बार्गेनिंग क्षमता बढ़ाना चाहते थे। लेकिन चैनल ने जिस तरह से जमीनी रिपोर्ट करनी शुरू की, उससे प्रसून से पहले से खार खाए बैठे सत्ता के शीर्ष की भृकुटि चढ़ गई। खबर है कि इन्कम टैक्स की कुछ तगड़ी नोटिसें भेजी गईं और चैनल बंद न करने पर भुगतने की धमकी भी दी गई। और जैसा प्रसून का ट्वीट बता रहा है, सौदेबाज़ी भी हुई।

सत्ता ने कहा कि 250 करोड़ लो और खल्लास करो। लाला ने कर दिया।

18 मार्च की शाम ‘जय हिंद’ में चौकीदारों का हाल बताने वाली यह रिपोर्ट देखिए और अंदाज़ा लगाइए कि परेशानानी क्या थी।


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