संविधान का सपना एक आर्किटेक्ट के रूप में नेहरू ने बुना, संविधान सभा मे अंबेडकर को जिताकर लाये थे गांधी और नेहरू।

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इंसानियत और हिन्दुस्तानियत की संवैधानियत

डाॅक्टर बाबा साहब अंबेडकर की संविधान निर्माण को लेकर भूमिका पर बहस मुबाहिसा संविधान समीक्षकों के बीच होता रहता है। यह भी कहा जाता है कि भीमराव अंबेडकर ही मूलतः संविधान के निर्माता हैं। आलोचक इसके उलट यह भी कहते हैं कि अंबेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष होने के नाते अपनी सीमित भूमिका में ही रहे। भारत का संविधान बनने की प्रक्रिया से कहीं आगे बढ़कर उन आनुषंगिक परिस्थितियों को देखने की जरूरत है जिनके मद्देनजर संविधान को बनाने की जरूरत महसूस हुई। द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म होते ही यह लगभग तय हो गया था कि भारत को कभी भी आजादी मिल सकती है। तब साथ साथ संविधान रचने की औपचारिकताएं भी शुरू हो गई थीं। यह वह दौर था जब आजादी की लड़ाई के सबसे बड़े संविधान सभा के सूरमा गांधी और उनके विचारों से अनुप्राणित कई महत्वपूर्ण नेता भी संविधान बनाने की वर्जिश करती सभा के चलते हाशिए पर भेजे जा रहे थे। अंगरेजी हुकूमत से लगातार संपर्करत रहने के कारण और अन्यथा भी अपनी सर्वाधिक लोकप्रिय छबि के चलते जवाहरलाल नेहरू पर ही महत्वपूर्ण दाय था कि आजाद भारत का संविधान और शासन किस तरह कारगर हो।

संविधान के प्रारूप पाठ से ही स्पष्ट हो गया था कि भारत में अगली पंक्ति के नेता देश में किसी तरह का विग्रह नहीं चाहते थे। संविधान सभा के सदस्यों का अनुपात समावेशी चरित्र का था। उसमें आजादी के युद्ध के बड़े सिपहसालार थे। उनके साथ राजेरजवाड़ों के प्रतिनिधि, राष्ट्रवादी मुसलमान और कई नौकरशाह और कानूनविद वगैरह भी शामिल किए गए। ज़िन्ना और उनके सहयोगियों की जिद के कारण पाकिस्तान निर्माण का फैसला हुआ। अन्यथा एकीकृत भारत रहने की स्थिति में मुस्लिम लीग के समर्थन की राह देखते बल्कि जिद करते गांधी व्यवाहारिक जीवन में अप्रासंगिक होते गए थे। इसमें कहीं शक नहीं है कि संविधान का सपना एक आर्किटेक्ट के रूप में नेहरू ने बुना और उसे सब सदस्यों के सामने विचार की तरह परोसा। उसके बाद प्रारूप समिति का गठन होते ही गांधी और नेहरू के सहयोग से अंबेडकर को जिताकर संविधान सभा में लाया गया। लाया तो डाॅक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी को भी गया लेकिन कन्जरवेटिव सोच में उनका कोई उल्लेखनीय योगदान हो नहीं सका। अंबेडकर आजादी की लड़ाई में नहीं थे लेकिन अपनी जहीन बुद्धि और यूरो अमेरिकी कानूनों के गहरे जानकार के रूप में उनका संविधान सभा में कोई मुकाबला नहीं था। उन्होंने जिस लगन, मेहनत और प्रतिबद्धता के साथ संविधान की एक एक इबारत को लेकर सदस्यों की जिरह को सुना। फिर अधिकारिक तौर पर अधिकांश संशोधनों को खारिज किया और कालजयी भाष्य में भारत के संविधान की सार्थकता का भविष्यवाचन किया। ऐसा नायाब उदाहरण दुनिया के किसी संविधान बनाने में किसी सदस्य का नहीं रहा होगा।

असल में नेहरू और अंबेडकर जिस तरह का हिन्दुस्तान बनाना चाहते थे उसमें पूरी तौर से कूपमंडूक पूर्वग्रहों, सडांधयुक्त परम्पराओं और अवैज्ञानिक वृत्ति से बचाने की पेशकश होनी थी। दोनों बुद्धिजीवियों का दृष्टिकोण समकालीन यूरो-अमेरिकी मूल्यों की लोकतांत्रिक सार्थकता से सराबेार था। वे ऐसा पौधा भारत की वैचारिक जमीन पर रोप रहे थे। उन्हें जातिवाद, कथित ब्राह्मणवाद, छुआछूत, कुरीतियों, अशिक्षा, प्रांतीयता और क्षेत्रीयता जैसे तत्वों से संविधान के संदर्भ में कुछ आयातित नहीं करना था। वे जानते थे इस देश में जातिवाद और छुआछूत की जड़ेें सामाजिक आदतों में बहुत गहरी हैं। इसके बावजूद संविधान में ऐलान हो गया कि छुआछूत का अंत हो गया। अंबेडकर दरअसल इंसान की सामाजिक दुर्बलताओं को संविधान की अनुकूलता के रास्ते दूर करना चाहते थे। इसमें उनको नेहरू का समर्थन और संरक्षण हासिल था। गांधी का नजरिया अलग होने से उनके विचारों को सरसरी तौर पर खारिज कर दिया गया।

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ऐसा नहीं है कि धार्मिक कठमुल्लापन को लेकर अम्बेडकर ने मुसलमान कूपमंडूकता पर विचार व्यक्त नहीं किया। यह अलग बात है कि उनके ऐसे उल्लेख को बीन-बीनकर दक्षिणपंथी तत्व संकीर्ण हिन्दुओं का रहनुमा बनाने की निंदनीय कोशिशें करते हैं। जातिप्रथा की विभीषिका के चलते अंबेडकर ने दलितों पर हो रहे अत्याचारों का वीभत्स अपनी छाती पर भी झेला था। इसलिए बाद में वे हिन्दू धर्म छोड़कर लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म में चले गए। वहां उन्हें जातीय आधार पर समरसता की तलाश थी। संविधान का सम्भावित वैज्ञानिक चेहरा अंबेडकर ने नेहरू के साथ मिलकर उकेरना चाहा। मनुष्य की गरिमा और उसकी अभिव्यक्ति पर नियंत्रण को लेकर भी अंबेडकर की प्रतिभा आज तक सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में दुर्लभ मेधा की तरह झरती रहती है। एक बड़े भाजपा में रहे पत्रकार ने अलबत्ता अंबेडकर के खिलाफ कड़ी भाषा में एक किताब भी लिखी है। उसमें बार बार अंबेडकर को फकत प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में चित्रित करते हुए उनके विचारों पर हमला किया गया है। यदि बाबा साहब में भविष्यमूलकता नहीं होती तो आज भारतीय राजनीति में अंबेडकर की समझ और उनके अनुयायियों की ताकत और भूमिका को लेकर यादध्यानी की तरह बाबा साहब का जिक्र क्यों होता। संविधान सभा में कई दूसरे सदस्य भी थे। उनके कथ्यों को ठीक से समझा और सुना भी नहीं गया। यह बात भी लेकिन अंबेडकर और यूरो अमेरिकी समर्थकों को ऐतिहासिक आत्मावलोकन के जरिए समझनी होगी। कुल मिलाकर यह असाधारण बुद्धिजीवी सैकड़ों देशभक्तों और विद्वानों के जमावड़े में अपनी प्रतिभा के कारण इतिहास में स्थायीपन के साथ दर्ज हो गया है। यह अंबेडकर का ही व्यक्तित्व है।

संविधान सभा में कई जहीन और वाचाल सदस्य भी थे। कुछ अंबेडकर के साथ थे और कुछ उनकी नीतियों के आलोचक रहे हैं। इतिहास में नेहरू और अंबेडकर के अलावा कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, गोपालस्वामी आयंगर, अलादि कृष्णास्वामी अय्यर, हरिविष्णु कामथ, प्रोफेसर के. टी. शाह, दामोदर स्वरूप सेठ, काजी करीमुद्दीन, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे और बहुत से सदस्यों का अलग अलग परिमाण और समझ के आयतन का योगदान है। सभा में अंबेडकर की प्रतिभा जैसे परवान चढ़ी थी। वे अपने ज्ञान का जिरहबख्तर पहनकर एक सैनिक की तरह आक्रमण के हथियारों का सचेष्ट बौद्धिकता के साथ संजीदा जवाब पेश करते थे। एक एक ईंट की तरह अपने तर्क रखते अंबेडकर संविधान सभा की नजर में अपनी बौद्धिक जिद के भी अनोखे पैरोकार हैं। संविधान सभा के बहुमत में उन सब संशोधनों को खारिज किया गया जिनसे बाबा साहब की तार्किक असहमति होती थी। कई संशोधनों को उन्होंने स्वीकार भी किया। कुल मिलाकर संवैधानिक सभा में अपनी जगह बनाकर असहमति के स्पेस में अपनी इतिहाससिद्ध भूमिका तलाश कर अंबेडकर ने शिक्षा, शोध और बौद्धिकता को नायाब, सार्थक, भविष्यमूलक हथियारों के रूप में इस्तेमाल कर आगे आने वाले वक्त के लिए भी अपनी अविचल स्थिति स्थापित तो कर ली हैै – कनक तिवारी


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