गाय माता की चिंता सी दिखाने वाली बीजेपी सरकार को यह सब क्यो नही दिख रहा है ?

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इन तस्वीरों में कुछ भी नया नहीं है। हर शहर और गाँव-क़स्बे की कहानी है। गाय को लेकर राजनीति ही की गई। उसका एक ही मक़सद था, दो धर्मों के बीच गाय खड़ी कर दो। गायें खडीं हो गईं खेतों में। किसान दौड़ने लगा गाय और सांड के पीछे। खेतों में कँटीली तारें बाँधी जाने लगी। गायें छलनी होने लगीं। किसानों की जेब खाली होने लगी। गाँवों में चारागाह की ज़मीन पर दबंगों का कब्ज़ा है। गौ माता के नाम पर इनके ख़िलाफ़ कोई चूँ तक नहीं बोलेगा क्योंकि यही लोग उन संगठनों में हैं जो गौ रक्षा के नाम पर राजनीति करते हैं।

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प्लास्टिक और पोलोथिन को परास्त करना असंभव हो गया है। कहीं भी बजबजाती दिख जाती है। नीति बनाने और लागू करने की संस्थाओं की घोर नाकामी के अलावा समाज की भी है। सरकारें चालाक हैं। समाज की नाकामी को पहले नंबर पर कर देती हैं। मामला व्यवस्था का है। इसका अनुशासन ही समाज को बदलेगा। शहरी विकास प्राधिकरणों ने चारागाह की ज़मीन रखी नहीं। ग़ाज़ियाबाद नगर निगम की यह जगह है। गायों, बछड़ों और साँड़ों का समूह पोलिथिन की गंजी थैलियों के बीच खाने के लिए कुछ खोज रहे थे। भावुक मत होइये। वर्ना स्वच्छता के विज्ञापन पर सारा ख़र्च हो जाएगा और काम कुछ भी नहीं होगा।


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