स्किल इंडिया के तहत रोजगार देने आए थे, लेकिन खुद ही बेरोजगार हो गए।

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सन 2015 में सरकार ने प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना लांच की थी. इस योजना के तहत 2016 से 2020 के बीच अलग-अलग सेक्टर में एक करोड़ युवाओं को ट्रेनिंग देने की बात कही गई थी. सरकार के तरफ से इस योजना के लिए 12000 करोड़ का बजट भी रखा गया है. इस योजना के तहत पूरी देश मे 2500 से भी ज्यादा सेन्टर खोले गए. कई लोगों ने अपना नौकरी छोड़कर सेन्टर खोलने में पैसा लगाया. स्किल इंडिया सेन्टर की हालत बहुत खराब है. दिल्ली में कई सारे सेंटर बंद हो गए हैं. सरकार द्वारा स्किल इंडिया की पॉलिसी में बार-बार बदलाव की वजह से फ्रैंचाइज़ी सेंटर बंद हो गए हैं या फिर काम नहीं मिल रहे है. पिछले कुछ दिनों एनडीटीवी ने ऐसे कई सेंटर गया और इनके मालिक से बात की.

धीरज को एक साल से काम नहीं मिला
धीरज अरोरा द्वारका के रहने वाले हैं. जनवरी 2017 को धीरज ने अपना सेन्टर खोले थे. आज भी धीरज के सेन्टर पहुंचते ही प्रधानमंत्री के फोटो आपको देखने को मिलेगा. इस तस्वीर में प्रधानमंत्री तो मुस्कुराते हुए नज़र आएंगे लेकिन धीरज की मुस्कान पिछले एक साल से ग़ायब है. पिछले एक साल से धीरज को काम नहीं मिला है. कमरे सब खाली पड़े हैं. सरकार के तरफ से सीट सेंक्शन नहीं किया गया है. सेंटर बनाने के लिए धीरज को 12 से 15 लाख खर्च हुए थे. पहले साल 780 के करीब सीट सेंक्शन हुई थी लेकिन पिछले एक साल में सीट सेंक्शन नहीं हुई. धीरज यहां पर चार कोर्स शुरू किए थे. सभी कोर्स अभी बंद है. सरकार के तरफ नीतियों में बदलाव के वजह से धीरज जैसे लोग प्रभावित हैं.

पालिसी बदलने से परेशान है सेन्टर के मालिक
धीरज 50000 का किराया दे रहे और टीचर्स की तन्ख्वाह मिलाकर महीने में एक लाख खर्च हो जाता है. धीरज का कहना है कि पालिसी बदल गई हैं. आजकल ट्रेड पार्टनर या टीपी बनने के लिए टर्नओवर ज्यादा होना चाहिए जो पहले नहीं था. एक टीपी के अंदर कई सेन्टर होते हैं और वो छोटे फ्रैंचाइज़ को काम दे रहा है. इसके लिए टीपी अपने लाभ भी देखता है और कई बार काम देने के लिए ब्लैक मेलिंग भी करता है. परेशान करता है. यहां टीपी मिडिल मैन के रूप में काम कर रहा है जो सरकार से काम लेता है और फ्रैंचाइज़ को देता है. इसीलिए जो फ्रैंचाइज़ सेन्टर हैं उनकी कमाई भी कम हो गई है. धीरज का कहना है सब कुछ एक फ्रैंचाइज़ करता है लेकिन बीच मे टीपी को लाने की क्या जरूरत है. फ्रैंचाइज़ को डायरेक्ट काम क्यों नहीं मिलता है. धीरज ने कहा वो टीपी के साथ भी काम करने के लिए तैयार है लेकिन उन्हें काम नहीं मिल रहा है.

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प्लेसमेंट नहीं तो काम नहीं
इस उम्मीद में धीरज ने अपना सेन्टर बंद नहीं किया है कि कहीं आगे काम मिल जाए. आजकल काम तब मिलता है जब प्लेसमेंट की जाती है. प्लेसमेंट अगर हुआ है तो सेन्टर को सैलरी स्लिप के साथ साथ अपॉइंटमेंट लेटर जमा करना पड़ता है लेकिन जो भी बच्चे ट्रेनिंग लेकर जाते हैं उनका प्लेसमेंट कहीं मल्टीनेशनल कंपनी में नहीं हो सकती है. कहीं छोटी जगह पर कम वेतन में होती है. ऐसे में यहां न अपॉइंटमेंट लेटर मिलता है ना सैलरी स्लिप. तो फिर सरकार इसे प्लेसमेंट नहीं मानती है. धीरज ने एक उदाहरण दिया कि वे सिलाई का ट्रेनिंग दे रहे थे और सिलाई सीखकर जिन बच्चों की प्लेसमेंट हो रहा था वो किसी छोटे बुटीक में होता था. बुटीक वाला न तो अपाइंटमेंट लेटर देगा न सैलरी स्लिप, ऐसे में यह प्लेसमेंट नहीं माना जाएगा. अपनी रोजी रोटी के लिए धीरज ने यहां प्राइवेट कोर्स शुरू किए हैं लेकिन बच्चे पैसा देकर पढ़ने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि यह सेंटर प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत शुरू किया गया था और बच्चे फ्री में पढ़ना चाहते हैं. जबकि धीरज फ्री में नहीं पढ़ा सकते हैं क्योंकि सीट सेंक्शन नहीं हो रही है.

रोज़गार देने आए थे खुद बेरोज़गार हो गए सौरभ
ऐसी एक कहानी सौरभ की है. सौरभ पहले कोटक महिंद्रा बैंक में नौकरी करते थे. जब प्रधानमंत्री कौशल योजना शुरू हुई तो सौरभ ने काफी प्रभावित होकर अपनी नौकरी छोड़ दी और सेन्टर खोला. सेन्टर बनाने में 6 लाख के करीब ख़र्चा हुआ लेकिन सौरभ को कुछ महीने पहले अपना सेन्टर बंद करना पड़ा. सौरभ ने कहा कि सरकार की तरफ से काम नहीं मिला. सौरभ को जितने टार्गेट दिए गए वो पूरे किये प्लेसमेंट भी दिए लेकिन एक साल बाद काम नहीं मिला. सौरभ को अपने सामान को रद्दी रेट से बेचना पड़ा. सौरभ ने कहा कई मीडिया चैनल इनकी समस्या शूट करके गए लेकिन दिखाए नहीं. धीरज दूसरों को रोजगार देने आए थे लेकिन खुद बेरोजगार हो गए.

ऐसे हमें और कई सेन्टर भी मिले जहां काम नहीं मिले है या टीपी के जरिये काम मिला है, लेकिन यह लोग मीडिया के सामने आकर बात करने के लिए तैयार नहीं हैं

साभार एनडीटीवी


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