अरे मोदी जी, अब तो जी न्यूज देखना बंद कर दो, पं नेहरू जब कुंभ में आए तो हजारों लोग मारे गए थे, ये झूठी कहानी किसलिए ?

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पीएम मोदी ने फिर झूठ बोला कि पंडित नेहरू जब कुंभ में आए तो अव्यवस्था के कारण भगदड़ मच गई थी, हजारों लोग मारे गए थे। अरे मोदी जी कम से कम अब तो जी न्यूज देखना बंद कर दो।

कौशांबी में एक चुनावी जनसभा में 1954 में आज़ादी के पहले कुंभ और साल 2019 के कुंभ की तुलना करने और नेहरू के आने के कारण मची भगदड़ जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दावों पर सवाल उठ रहे हैं। सवाल इस बात पर भी उठ रहे हैं कि उस वक़्त की मीडिया पर ‘ख़बर दबाने’ संबंधी आरोपों में कितनी सच्चाई है और इसके आधार क्या हैं ?

कौशांबी की जनसभा में प्रधानमंत्री ने 1954 के कुंभ का ज़िक्र कुछ इस तरह किया, “एक बार पंडित नेहरू जब कुंभ में आए तो अव्यवस्था के कारण भगदड़ मच गई थी, हजारों लोग मारे गए थे, लेकिन सरकार की इज़्ज़त बचाने के लिए, पंडित नेहरू पर कोई दोष न लग जाए इसलिए, उस समय की मीडिया ने ये दिखाने की बहादुरी नहीं दिखाई. कहीं ख़बर छपी भी तो वह एक-दो कॉलम की किसी कोने में खबर छपी थी.”

नरेश मिश्र

पहले बात 1954 में कुंभ में मची भगदड़ की. 1954 का कुंभ आज़ाद भारत में कुंभ का पहला आयोजन था. हालांकि उससे पहले 1948 में अर्धकुंभ हो चुका था. प्रयागराज में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार नरेश मिश्र आज़ादी के बाद के लगभग सभी कुंभ और अर्धकुंभ के न सिर्फ़ साक्षी रहे हैं बल्कि इनमें से ज़्यादातर को उन्होंने कवर भी किया है और बहुत कुछ लिखा भी है.

क्या हुआ था उस दिन

1954 में उस दिन जो कुछ हुआ था, नरेश मिश्र ने उसे अपनी आंखों से देखा था. उनका कहना है कि उस समय वो पत्रकार तो नहीं थे लेकिन 22 वर्ष की उम्र में पत्रकार बनने की तैयारी कर रहे थे, यानी कई जगहों पर ख़बर लिखकर देते थे।

कुंभ मेले के दौरान उनसे 1954 के कुंभ आयोजन और उस वक़्त मची भगदड़ के विभिन्न पहुलओं पर उनसे लंबी बातचीत हुई थी. उस बातचीत में नरेश मिश्र ने उस पूरी घटना को याद किया है, जो उन्होंने देखी थी.

उनका कहना था, “उस वक़्त बहुत साधन नहीं थे और व्यवस्था के नाम पर भी करने के लिए बहुत कुछ नहीं था. ज़्यादातर लोग अपनी ज़रूरत का सामान ख़ुद ही लेकर आते थे. फिर भी श्रद्धालुओं और कल्पवास करने वालों की सुविधा का ध्यान रखा गया था. प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ख़ुद तैयारियों का जायज़ा लेने आए थे और फिर लौट गए थे. प्रशासनिक ज़िम्मेदारी उस समय के बहुत ही सख़्त और तेज़-तर्रार माने जाने वाले अधिकारी जमना प्रसाद त्रिपाठी को दी गई थी. ख़ुद प्रधानमंत्री पंडित नेहरू उनकी क़ाबिलियत से प्रभावित थे और इसीलिए उन्हें ये ज़िम्मेदारी दी गई थी. जमना प्रसाद उस समय थे तो अधेड़ उम्र के, लेकिन उनकी चुस्ती देखने लायक़ थी.”

नरेश मिश्र बताते हैं, “जमना प्रसाद को पूरा भरोसा था कि वो मेले को सकुशल संपन्न करा देंगे. उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी निभाई भी लेकिन ज़रा सी चूक और संचार साधनों के अभाव ने उसे इतनी बड़ी घटना में तब्दील कर दिया. उस समय मेला क्षेत्र के दूसरी ओर परेड ग्राउंड में एक अस्थाई स्टेशन बनाया गया था और वहीं से गाड़ियां हर जगह के लिए जाती थीं. चूंकि लोग पढ़े लिखे ज्यादा नहीं थे इसलिए कौन सी गाड़ी किस दिशा में जाएगी इसके लिए उन पर चिह्न बनाए गए थे. इस बारे में एनाउंसमेंट की जाती थी. लोग स्टेशन से उतरकर सीधे मेले की ओर पैदल ही पहुंच जाते थे. शहर के लोग भी परेड की ओर से ही मेले में आते थे.परेड में ही कोतवाली बनाई गई थी।

हादसे वाले दिन यानी आमावस्या को याद करते हुए नरेश मिश्र कहते हैं, “उस दिन सुबह से ही साधु-संतों का शाही स्नान चल रहा था. लगभग साढ़े आठ बजे एक अप्रत्याशित घटना हो गई. हुआ ये कि शहर की तरफ़ से संगम स्नान के लिए जाने वालों की भीड़ संगम चौराहे पर इकट्ठी हो गई. यानी ठीक उसी जगह पर जहां आज दाहिनी तरफ़ दत्तात्रेय मंदिर है और बाईं ओर गंगा मंदिर है. इधर से भीड़ संगम स्नान के लिए आगे बढ़ने को व्याकुल थी और उधर से संगम स्नान कर लौटने वाले हज़ारों श्रद्धालुओं की भीड़ भी वहीं पहुंच गई. बीच में संगम के नीचे की ओर से जो सड़क पातालशाही हनुमान मंदिर की ओर जाती है, वहां से दशनामी संन्यासियों का पेशवाई जुलूस निकल रहा था. पुलिस और प्रशासन से यही चूक हो गई कि उन्होंने दो अखाड़ों को बीच में रोक कर आने जाने वाले लोगो को रास्ता नहीं दिया. यानी दो अखाड़ों के बीच के समय में अंतराल नहीं रखा गया था.”

पंडित नेहरू कब आए थे कुंभ

नरेश मिश्र बताते हैं कि प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू उससे ठीक एक दिन पहले आए थे, उन्होंने संगम क्षेत्र में जाकर तैयारियों का जायज़ा लिया और फिर वापस दिल्ली चले गए. लेकिन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद संगम क्षेत्र में ही थे और सुबह के वक़्त किले के बुर्ज पर बैठकर दशनामी संन्यासियों का जुलूस देख रहे थे.

आज़ाद भारत का पहला कुंभ देखा आपने?
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उनके मुताबिक़, “वो कुर्सी पर बैठे थे जिस पर लाल रंग का छत्र लगा था. जब जुलूस सामने से निकलता तो राष्ट्रपति खड़े होकर उनका अभिवादन करते. राष्ट्रपति को दिखाने के लिए संन्यासियों में भी उत्साह बढ़ जाता और वो काफ़ी देर रुककर वहां अपने तलवार-भाले भांजने लगते. मैं उस दृश्य को कभी भूल नहीं सकता.”

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नरेश मिश्र बताते हैं कि एक ओर जुलूस निकलता रहा और दूसरी ओर संगम चौराहे पर श्रद्धालु व्याकुल हो रहे थे, “गंगा मंदिर की बायीं ओर एक तालाब था जहां बरसात का पानी भर जाता था और बाढ़ के बाद गंगाजी का रुका हुआ पानी भी उसमें भर जाता था. उस वक़्त तालाब में कीचड़ था क्योंकि तालाब बहुत गहरा नहीं था इसलिए पानी निकलने के बाद वहां कीचड़ ही रहता था. दोनों ओर से लोगों की भीड़ संगम चौराहे पर बढ़ती ही जा रही थी. तभी एक पेशवाई जुलूस से दूसरे जुलूस के बीच जैसे ही कुछ मिनटों का अवकाश मिला लोग ख़ुद ही वहां से निकलने की कोशिश करने लगे. ऊपर वाले लोग नीचे भागे और नीचे वाले ऊपर की ओर. यह दृश्य देखते ही पुलिस वालों के हाथ खड़े हो गए. वो खुद को असहाय महसूस करने लगे क्योंकि भीड़ को रोकने का उनके पास कोई तरीक़ा नहीं था.”

नरेश मिश्र के मुताबिक़, “वहीं से भगदड़ शुरू हुई और पैंतालीस मिनट तक महाकाल का तांडव चलता रहा. कितने मर गए, कुछ पता ही नहीं चला. जान बचाने के लिए लोग इधर से उधर भाग रहे थे, ये देखे बिना कि जिधर वो भाग रहे हैं, मौत वहां भी खड़ी है. कुछ लोग कीचड़ भरे उस गड्ढे में भी कूदे जहां कुछ ही देर बाद लाशों का ढेर बिछ गया।

प्रयागराज के कुछ अन्य वरिष्ठ पत्रकारों की भी मानें तो इसके कोई साक्ष्य नहीं हैं कि नेहरू के आने से कुंभ में भगदड़ हुई. यही नहीं, तमाम स्थानीय लोगों के बारे में भी इस संबंध में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है. ये ज़रूर है कि उस घटना के साक्षी रहे या फिर उसके बारे में सुन चुके लोग नरेश मिश्र की इस बात पर ज़रूर सहमति देते हैं कि नेहरू एक दिन पहले आए थे और तैयारियों का जायज़ा लेकर वहां से चले गए थे. प्रयागराज में वरिष्ठ कांग्रेस नेता अभय अवस्थी इस कुंभ के बारे में वो संस्मरण सुनाते हैं जो इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी रहे उनके पिता पंडित मूलचंद अवस्थी ने उन्हें सुनाया था.

भगदड़ और अफ़रातफ़री

अभय अवस्थी कहते हैं, “मेरे पिताजी जब तक जीवित रहे कुंभ मेले या फिर माघ मेले में हर रोज़ सुबह संगम स्नान के लिए ज़ीरोरोड से पैदल ही जाते थे. आमावस्या के उस स्नान पर्व पर हुए हादसे को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था. पिताजी बताते थे कि शाही स्नान के दौरान ये अफ़वाह फैली कि नेहरू का हेलीकॉप्टर मेला क्षेत्र में आ रहा है. कुछ लोग उन्हें देखने की लालसा से खाली स्थान की ओर भागे. अव्यवस्था देखकर कुछ नागा साधु उग्र हो गए और उन्होंने अपनी तलवार-चिमटों इत्यादि से लोगों पर हमला कर दिया. लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे.”

अभय अवस्थी कहते हैं कि आमावस्या के एक दिन पहले नेहरू जी आए भी थे और उन्होंने संगम में स्नान भी किया था, लेकिन उसी दिन वो तैयारियों से संतुष्ट होकर वापस लौट गए थे. अभय अवस्थी के मुताबिक, कुंभ का अंतरराष्ट्रीयकरण भी नेहरू ने ही किया था और ख़ुद कई विदेशी अख़बारों और पत्रिकाओं में कुंभ के संदर्भ में उनके लेख प्रकाशित हुए थे.

वरिष्ठ पत्रकार नरेश मिश्र कहते हैं कि पैंतालीस मिनट की ये स्तब्धकारी घटना थोड़ी देर में अपने आप नियंत्रित हो गई, “कम से कम सात-आठ सौ लोग मारे गए. ये प्रशासन का आंकड़ा था लेकिन मैंने अपनी आंखों से जो देखा था और उसके बाद जो कुछ सुना था उस हिसाब से ये संख्या उससे भी ज़्यादा रही होगी.”

नरेश मिश्र कहते हैं कि घटना के बाद लोगों ने जान बचाने के लिए क्या-क्या नहीं किया. उनके मुताबिक़, उस समय के फ़ोटोग्राफ़रों की बाद में ऐसी कई तस्वीरें अख़बारों में छपीं. एक व्यक्ति तो टेलीफ़ोन के खंभे पर चढ़ गया. बहरहाल, क़रीब पैंतालीस-पचास मिनट का दृश्य बेहद भयावह था. जिधर देखो लाशें ही पड़ी थीं. घायल लोगों को पुलिसवालों ने परेड ग्राउंड में ही बने अस्पताल में पहुंचाना शुरू किया.

उनके मुताबिक़, “अख़बारों में इस घटना की बहुत दिन तक चर्चा होती रही. उस समय मुख्य रूप से लीडर, भारत, अमृत बाज़ार पत्रिका और आज अख़बार होते थे और इन सभी जगहों पर काफ़ी दिनों तक ख़बरें छपती रहीं. अख़बारों में ये बात प्रमुखता से लिखी गई कि वीआईपी का ध्यान तो रखा गया लेकिन आम श्रद्धालुओं का ध्यान नहीं रखा गया. उस समय के अख़बार बहुत स्वतंत्रतापूर्वक लिखते थे और किसी को भी दोषी ठहरा देने में भी नहीं हिचकते थे.”

कौशांबी में बुधवार को प्रधानमंत्री ने ये भी कहा कि अख़बारों में घटना से संबंधित ख़बरों को दबा दिया गया और मीडिया ने सच्चाई बताने की हिम्मत नहीं दिखाई. लेकिन पत्रकारिता से जुड़े वरिष्ठ लोग न सिर्फ़ इस बात से असहमत हैं बल्कि तथ्यों से भी परे बताते हैं.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के प्रोफ़ेसर और ख़ुद कई कुंभ आयोजनों को कवर चुके प्रोफ़ेसर धनंजय चोपड़ा कहते हैं, “उस समय का मीडिया जितना ईमानदार था, उतना तो कभी नहीं रहा. उस समय का मीडिया भारत को बनाने का काम कर रहा था. आज़ादी के तुरंत बाद का मीडिया था जिसने ख़ुद आज़ादी के आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. उस समय का मीडिया वह मीडिया था जो पंडित मदनमोहन मालवीय और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकारों की परवरिश से आगे बढ़ा हुआ था. इस घटना को मीडिया ने दबाया, ये कहना ठीक नहीं होगा. दूसरे, उस समय मीडिया पर कॉर्पोरेट का कोई दबाव नहीं था.”

सवाल यह भी है कि उस समय की मीडिया का तंत्र क्या इतना विकसित था जो घटना को दबाने का काम करता और उसके दबाने से सच्चाई दब जाती. जानकारों के मुताबिक़, यह उतनी बड़ी ख़बर थी महीनों पत्रकार संगम क्षेत्र के चक्कर लगाते रहे और उससे जुड़ी ख़बरें प्रकाशित होती रहीं।

साभार बीबीसी


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