जिनका अपना कोई इतिहास नहीं होता, वे दूसरों के इतिहास से छेड़छाड़ करके उसे अपना बनाते हैं

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नाम बदलने की राजनीती बंद होने का नाम नही ले रही है जिनका अपना कोई इतिहास नहीं है, वे दूसरों के इतिहास से छेड़छाड़ करके उसे अपना बना रहे हैं।

सवाल ये है कि हज़रतगंज चौराहा, मुग़लसराय, औरंगजेब रोड का नाम ही क्यों बदला जा रहा है ? क्या ये देश इतना साम्प्रदायिक हो चुका है कि मुस्लिम इतिहास और इनकी पहचान से जुड़ी हुई चीज़ों को देखना पसंद नहीं कर रहा है ? क्या सियासत इतनी डर चुकी है जो मुसलमानों के अस्तित्व से जुड़े हुये तमाम दस्तावेजों को ख़त्म करने पे तुली है ?

अगर किसी को श्रद्धांजलि ही देनी है तो उनके नाम पर अलग चौराहा या अलग रोड क्यों नहीं बनाया जा रहा है ? क्यों नहीं बहुसंख्यक समाज के नाम पर बने सड़कों एवं चौराहों का नाम बदला जा रहा है ? हज़रतगंज जो कि लखनवी तहजीब-ओ-शकाफत एक मरकज़ है, जिसकी तारीख़ दो सौ साल पुरानी है, इसका नाम आते ही अदब और तहजीब की एक रवायत सी महसूस होने लगती है, जो पूरी दुनिया में अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर है। क्या इस चौराहे का नाम बदल देने से अटल जी की सच्ची श्रद्धांजलि पूरी हो जाएगी ?

आख़िरी बात, जिन कौमों का अपना कोई इतिहास नहीं होता है वो दूसरी कौमों के इतिहास से छेड़छाड़ करके उसे अपना बनाती रहती हैं। हमारा इतिहास इतना शानदार रहा है कि अगर हम नहीं होते तो हज़रतगंज छोड़िए पूरा का पूरा लखनऊ ही नहीं होता। आप कितने नाम बदलेंगे ? सात पीढ़ियाँ गुज़र जाएँगी फिर भी बदल नहीं पाओगे क्योंकि तारीख़ के हर पन्ने पे हमारी मुहर लगी हुई है।

कल कोई आपका नाम बदल दे तो

एक दिन सियासत तुम्हारा नाम निसार से बदलकर नरेश कर देगी और तुम बस लोकतंत्र को बचाते रहना। नाम बदलना कोई छोटी बात नहीं है। ये तुम्हारी विरासत, तुम्हारे आब-ओ-अजदाद की कुर्बानियां, तुम्हारी तारीख़ के साथ सबसे बड़ा हमला है। यक़ीन न हो तो जाके यूरोप में उन शहरों को देख लो कि जहाँ तुम्हारे पूर्वज सैकड़ों साल हुकूमत किए हैं, जिस यूरोप को डार्क एज से निकाल कर वहाँ इंसानों को रहने के लायक एक ख़ूबसूरत निज़ाम दिया था वहाँ आज तुम्हारा नाम लेने वाला नहीं है। तुम्हारा बनाया हुआ शहर, तुम्हारी इमारतें, तुम्हारी तामीर की गई सड़कें आज किसी और के नाम से जानी और पहचानी जाती हैं।

बेग़म हज़रत महल और अटल

प्रथम स्वाधीनता संग्राम का पूरे अवध में नेतृत्व करने वाली हज़रत महल के नाम से मशहूर हज़रत गंज चौराहे के नाम, अंग्रेज़ो के मुखबिर अटल बिहारी के नाम पर रख दिया गया है। ठीक है 23 अपराध में शामिल अपराधी की सरकार है जब तक है ये सब होगा । सवाल उन महान लोगो से है जिन्होंने एक मुखबिर के मरने के बाद उसको महान बनाया था।

महान आपने बनाया महानता हम झेले, आप उनकी मुखबिरी भूल गए, आपको नेली में उनका भाषण याद नही रहा आप उनकी समतलीकरण योजना भूल गए, दूसरो को राजधर्म की बात करने वाले खुद राजधर्म भूल गए और हज़ारो को मरता देखते रहे फिर गोआ में ज्ञान दिया कि मुसलमान मिल कर नही रह सकते दंगे करते है, ओडिशा में ग्राहम स्टेन और उनके बच्चों की लींचिंग को सही बताने वाले को आप महान,भारत रत्न और सेक्युलर बताएंगे तो यही होगा।

जिस तरह अटल के मरने के बाद गंगा जमनी के वन वे चलने वालों ने उन्हें महान बनाया उसके बाद लग रहा है कि आडवाणी और तोगड़िया के मरने के बाद भी आप उन्हें भी महान बना देंगे क्योकि मुल्क के सेक्युलरिज़्म का भार आपके कंधे में ही रखा है। जब आप अटल की साम्प्रदायिकता को नार्मल बना देंगे तो आपको आडवाणी मिलेंगे और जब आप आडवाणी को नार्मल करेंगे तो मोदी मिलेंगे और मोदी के बाद योगी और ये सिलसिला चलता रहेगा, लेकिन इसका खामियाजा उनको भुगतना पड़ेगा जिन्होने इस मुल्क के लिए जान माल सब कुछ दिया लेकिन उनका नाम तो क्या निशा भी नही रहेगा – नदीम ख़ान

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